भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१०८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—कृष्ण ने पर्वतराज गोवर्द्धन को उठा लिया। कृष्ण सबसे कहते हैं कि धैर्य धरो, गोवर्द्धन पर्वत सहायता कर रहा है। नंद, गोप तथा ग्वालो के सामने देव ने यह प्रत्यक्ष सुनाकर कहा। (तुम लोग) व्याकुल होकर क्यो घूमते हो देवता आकर रक्षा करता है। गिरि देवता सत्य वचन कहते हैं कि कृष्ण मुझे हाथ से उठाकर ऊँचा कर दे। सूरदास कहते है कि ब्रज के नर और नारी कृष्ण से कहते हैं कि तुम धन्य हो ॥७२॥ गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं। करत विचार सबै ब्रजवासी, भय उपजत अति उर तैं। लै-लै लकुट ग्वाल सब धाए, करत सहाय जु तुरतैं। यह अति प्रबल, स्याम अति कोमल, रबकि रबकि हरबर तैं। सप्त दिवस कर पर गिरि धारयौ, वरसि थक्यो अम्बर तैं। गोपी ग्वाल नंद-सुत राख्यो, मेघ-धार जलधर तैं। जमलाजुन दोउ सुत कुवेर के, तेउ उखारे जर तैं। सूरदास प्रभु इन्द्र-गर्व हरि, ब्रज राख्यो करबर तैं ॥७३॥ अर्थ—पर्वत कृष्ण के हाथ से गिर न जाय। सभी ब्रजवासी (ऐसा) विचार करते हैं और हृदय मे अत्यधिक भय पैदा हो रहा है। लाठी ले लेकर सभी ग्वाल दौडे और तुरन्त सहायता करने लगे। यह (पर्वत) अत्यन्त प्रबल है, और कृष्ण अत्यन्त कोमल हैं, हड़बड़ मे यह कंपता है। सात दिन तक पर्वत को (कृष्ण ने) हाथ पर रखा। (बादल) आकाश से बरसते-बरसते थक गये। कृष्ण ने गोपी, ग्वाल आदि को बादल की जलधारा से बचाया। जमल तथा अर्जुन कुवेर के दोनो पुत्रों को जड़ से उखाड़ दिया। सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने इंद्र के गर्व को हर कर संकट से ब्रज की रक्षा की ॥७३॥ मेघनि जाइ कही पुकारि । दीन ह्वै सुरराज आगैं, अस्त्र दीन्हे डारि। सात दिन भरि बरसि ब्रज पर, गई नैकूँ न झारि । अखंड धारा सलिल निर्झरचौ, मिटी नहिं लगारि । धरनि नैंकु न बूँद पहुँची, हरषे ब्रज-नर-नारि । सूर घन सब इन्द्र आगैं, करत यहै गुहारि ॥७४॥ अर्थ—बादलो ने जाकर पुकार कर कहा और दीन होकर इन्द्र के आगे अस्त्र डाल दिये। सात दिन तक (हमने) ब्रज पर वर्षा की (ब्रज पर) कोई आंच नही आयी। अखंड धारा से पानी बरसाया, उसका क्रम टूटा नही। (लेकिन) धरती पर तनिक (भी) बूंद नही पहुँची, (इससे) ब्रज के नर-नारी प्रसन्न हो गये। सूरदास कहते हैं कि इन्द्र के आगे बादेल यही गोहार करते हैं ॥७४॥