भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला १०६ घरनि घरनि ब्रज होति बधाई । सात वरष को कुँवर कन्हैया, गिरिवर धरि जीत्यौ सुरराई । गर्व सहित आयौ ब्रज बोरन, वह कहि मेरी भक्ति घंटाई । सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, तव आयौ पाइनि तर धाई । कहाँ कहाँ नहिं संकट मेटत, नर-नारी सब करत बड़ाई । सूर स्याम अव कैं ब्रज राख्यो, ग्वाल करत सब नंद दोहाई ॥७५॥ अर्थ - ब्रज के घर-घर में बधाई हो रही है । सात वर्ष के कृष्ण ने गोवर्द्धन को धारण करके इन्द्र को जीत लिया । गर्व के साथ (इन्द्र के बादल) ब्रज को डुबाने के लिए आये थे । उसने (इन्द्र ने) कहा कि मेरी भक्ति को घटा दिया । सात दिन तक जल बरसा कर निराश हो गये तब दौड़कर पैरों के नीचे आये । कहाँ-कहाँ (कृष्ण) संकट नहीं मिटाते, नर-नारी सब बड़ाई करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने अब की बार ब्रज को रख लिया, (इससे) सभी ग्वाल नन्द की दुहाई दे रहे हैं ॥७५॥ (तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ कन्हैया । बार-बार भुज देखि तनक सें, कहति जसोदा मैया । स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी, ग्वालिन कियौ सहैया । लकुटिनि टेक सबनि मिलि राख्यो, अरु बाबा नँदरैया । मोसौँ क्यों रहतौ गोवरधन, अतिहिं बड़ौ यह भारी । सूर स्याम यह कहि परवोध्र्यौ, चकित देखि महतारी ॥७६॥ अर्थ- बार-बार छोटी-छोटी भुजाओ को देखकर यशोदा माता कहती है कन्हैया तुम्हारी बाहो में बहुत बल हो । कृष्ण कहते हैं कि हमारी भुजा दुखी नहीं (क्योकि) ग्वालो ने हमारी सहायता की । सब ने मिलकर लाठी की टेक लगा रखी थी और बाबा नन्द ने भी (सहायता की थी) । मुझसे गोवर्द्धन कैसे रखा जाता क्योकि वह बहुत भारी है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह कहकर चकित माता को समझाया ॥७६॥ मातु पिता इनके नहिं कोइ । आपुहिं करता, आपुहिं हरता, त्रिगुन रहित हैं सोइ । कितिक वार अवतार लियौ ब्रज, ये हैं ऐसे ओइ । जल-थल, कीट-ब्रह्म के व्यापक, और न इन सरि होइ । बसुधा-भार-उतारन-काजैं, आपु रहत तनु गोइ । सूर स्याम माता-हित-कारन, भोजन माँगत रोइ ॥७७॥ अर्थ- इनके (कृष्ण के) माता-पिता कोई नहीं हैं। ये स्वंय कर्त्ता है, हर्त्ता हैं, ये तीनों गुणो से रहित हैं। इन्होंने कितनी बार ब्रज मे अवतार लिया है, ये वही हैं। जल और स्थल तथा कीट और ब्रह्म सर्वत्र ये व्याप्त हैं और कोई इनके समान नहीं है। पृथ्वी के भार को उतारने के लिए अपने शरीर को छिपाकर रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि माता को प्रसन्न करने के लिए भोजन रोकर माँगते है ॥७७॥