भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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११० सूरसागर सार सटीक सुरगन सहित इन्द्र ब्रज आवत । धवल बरन ऐरावत देख्यौ उतरि गगन तैँ धरनि धँसावत । अमरा-सिव-रबि-ससि चतुरानन, हय-गय बसह हंस-मृग जावत । धर्मराज, बनराज, अनल, दिव, सारद, नारद, सिव-सुत भावत । मेढ़ा, महिषि, मगर, गुदरारौ, मोर, आखुमन वाहन, गावत । ब्रज के लोग देखि डरपे मन, हरि आगैँ कहि कहि जु सुनावत । सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, आवत चल्यौ ब्रजहिं अतुरावत । घेरौ करत जहाँ तहँ ठाढे, ब्रजवासिनि कौं नाहिं बचावत । दूरहिं तैँ वाहन सौं, उतरचौ, देवनि सहित चल्यौ सिर नावत । आइ पर्यौ चरननि तर आतुर, सूरदास-प्रभु सीस उठावत ॥७८॥ अर्थ—देवता गण सहित इंद्र ब्रज की ओर आते है। सफेद रंग के ऐरावत हाथी को देखो जिसे गगन से उतारकर पृथ्वी पर पैठा रहे (प्रवेश करा रहे) हैं। देवतागण, शिव, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, हाथी, घोडे, बैल, हस, मृग जितने हैं (वे सब) तथा धर्मराज, वनराज, अग्नि, दिव, नारद, सारद, गणेश आदि प्रार्थना करते हैं। भेड, भैंसा, मगर, गुडुरी नाम की चिडिया, मोर, चूहा, आदि वाहन गाते है। ब्रज के लोग इन सब को देखकर डर गये। कृष्ण के आगे कह कहकर सुनाते है। सात दिन तक जल की वर्षा समाप्त करके ब्रज को आतुर मरता हुआ (इन्द्र) चला आ रहा है। घेर कर (निंदा करते) खड़े हुए ब्रजवासियो से अपने को बचाता नही है। दूर से ही सवारी से उतरकर (इन्द्र) देवताओ के साथ सिर झुकाते हुए चले। आकर चरणों के नीचे आतुर होकर गिर पडे । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण सिर पकडकर उठाते हैं ॥७८॥ रास लीला जबहिँ बन मुरली स्रवन परीँ । चकित भईँ गोप कन्या सब, काम-धाम बिसरीँ । कुल मर्याद वेद की आज्ञा, नैंकहुँ नहीं डरीँ । स्याम-सिंधु, सरिता-ललना-गन, जल की ढरनि ढरीँ । अंग-मरदन करिवे कौँ लागीँ, उबटन तेल धरीँ । जो जिहिँ भाँति चली सो तैसेंहिँ, निसि बन कौँ जुखरीँ । सुत पति-नेह, भवन-जन-सका, लज्जा नाहिं करीँ । सूरदास-प्रभु मन हरि लीन्हौ, नागर नवल हरीँ ॥७६॥ अर्थ—जैसे ही बन (मे बजती हुई) मुरली (की ध्वनि) कान में पडी। (तब) गोप की कन्याये चकित हो गयी, और सभी काम-धंधा भूल गयी। कुल की मर्यादा तथा वेद की आज्ञा को तनिक भी नही डरी। कृष्ण रूपी सागर की ओर ब्रज की स्त्री रूपी नदियां जल की तरह ढल गयी। अग का मरदन करने मे लगी स्त्रियो ने उबटन तथा तेल रख दिया। जो जैसी थी वैसे ही रात मे बन की ओर चल पड़ी। पुत्र तथा पति

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