सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके स्नेह, घर के लोगों की शंका से लज्जा नही की । सूरदास कहते है कि चतुर तथा सुन्दर कृष्ण ने (गोपियों) के मन को हर लिया ॥७८॥ चली बन वेनु सुनत जब धाइ । मातु पिता-बाधव अति त्रासत, जाति कहाँ अकुलाइ । सकुच नहीं, संका कछु नाहीं, रैनि कहाँ तुम जाति । जननी कहति दई को घाली, काहे कौं इतराति । मानति नहीं और रिस पावति, निकसी नातौ तोरि । जैसैं जल-प्रवाह भादौं कौ, सो को सकै बहोरि । ज्यौं केंचचुरी भुअंगम त्यागत, मात पिता यौँ त्यागे । सूर स्याम कैं हाथ बिकानी, अलि अम्बुज अनुरागे ॥८०॥ अर्थ- वंशी सुनकर जब गोपियां वन की ओर दौड़कर चली, (तब) माता-पिता तथा बंधु आदि भयभीत करते हुए (पूछते है) आकुल होकर तुम लोग कहां जा रही हो । तुम्हे संकोच नही और न कुछ शंका है, रात मे तुम लोग कहाँ जा रही हो । माताये कहती हैं दैव की मारी क्यो इतराती हो । लेकिन (गोपियाँ) कहना नही मानती (जिससे) माताये और क्रोधित होती है । वे सब नाता तोड़कर निकल पडी । जैसे भादो के जल प्रवाह को कौन लौटा सकता है । जिस प्रकार सांप केंचुली त्याग देता है वैसे गोपियो ने माता-पिता को त्याग दिया । सूरदास कहते है कि वे सब कृष्ण के हाथ बिक गयी जिस प्रकार भौंरा कमल के अनुराग से (उसके हाथ बिक जाता है) ॥८०॥ मातु-पिता तुम्हरे धौं नाहीं । बारम्बार कमल-दल-लोचन, यह कहि-कहि पछिताहीं । उनकैं लाज नहीँ, बन तुमकौं आवन दीन्ही राति । सब सुंदर, सबै नवजोवन, निठुर अहिर की जाति । की तुम कहि आईं, की ऐसेहिं कीन्ही कैसी रीति । सूर तुमहिं यह नहीँ बूझियै, करो बड़ी विपरीति ॥८१॥ अर्थ - (कृष्ण गोपियो से पूछते हैं) सम्भवतः तुम्हारे माता-पिता नही है । बार- बार यह कहकर कमल के दल के समान आंख वाले कृष्ण पछताते है । उन लोगो को लाज नही जो तुम्हे रात मे वन आने दिया । सभी सुन्दरियां है तथा युवतियां है । अहीर की जाति बडी निठुर है । तुम लोग कहकर आयी हो या ऐसे ही चली आयी । (तुमने) कैसी रीति अपनायो। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण पूछते हैं) तुम लोगो को जान नही पड़ा तुमने बड़ा उलटा काम किया ॥८१॥ इहिं विधि बेद-मारग सुनौ । कपट तजि पति करी पूजा, कहा तुम जिय गुनौ । कंत मानहु भव तरौगी, और नाहिं उपाइ । ताहि तजि क्यौं विपिन आईं, कहा पायौ आइ ।