सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ सूरसागर सार सटीक विरध अरु बिन भागहूँ कौ, पतित जौ पति होइ । जऊ मूरख होइ रोगी, तजै नाहीं जोइ । यहै मैं पुनि कहत तुम सौं, जगत मैं यह सार । सूर पति-सेवा बिना, क्यों तरौगी ससार ॥८२॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) इस प्रकार वेद की रीति सुनो । कपट त्यागकर पति की पूजा करो (और) क्या तुम मन मे गुनती हो । पति मान करके भवसागर तर जाओगी और कोई उपाय नही है । उसे छोड़कर वन मे क्यों आई और यहाँ आने पर क्या मिला । बुड्ढा, अभागा, पतित, मूर्ख तथा रोगी कैसा भी पति हो उसको भी पत्नी के द्वारा नही छोड़ा जाना चाहिए । यही मैं तुमसे फिर कहता हूँ कि संसार मे यही सार है । सूरदास कहते हैं (कृष्ण समझाते है) पति की सेवा के बिना संसार को क्योकर पार करोगी ॥८२॥ तुम पावत हम घोष न जाहिँ । कहा जाइ लैहैं हम व्रज यह दरसन त्रिभुवन नाहिं । तुमहूँ तैं ब्रज हितू न कोऊ, कोटि कहौ नहिं मानैं । काके पिता, मातु हैं काकी, काहूँ हम नहिं जानैं । काके पति, सुत-मोह कौन कौ, घरही कहा पठावत । कैसौ धर्म, पाप है कैसो, आप निरास करावत । हम जानैं केवल तुमहीं कौं, और बृथा ससार । सूर स्याम निठुराई तजियै, तजियै वचन-विकार ॥८३॥ अर्थ—गोपियां उत्तर देती है कि तुम को पाते हुए हम अहीरो की वस्ती मे (वापस) नही जायेगी । ब्रज मे जाकर हम क्या पायेगी, यह (आपका) दर्शन संसार मे कही नही है । तुमसे अधिक हितकारक ब्रज मे ओर कोई नही है । आप हजारो बार कहे लेकिन हम मानती नही । किसके पिता (है) किसकी माता है । हम किसी को नही जानती । किसके पति, किसे पुत्र का स्नेह है और आप किसके घर भेजते है । कैसा धर्म, कैसा पाप, आप हमे निराश करते है । हम केवल आप ही को जानती है और संसार व्यर्थ है । हे कृष्ण निठुराई तथा उल्टी बातो को छोड़ दीजिए ॥८३॥ कहत स्याम श्रीमुख यह वानी । धन्य-धन्य दृढ़ नेम तुम्हारौ, बिनु दामनि मो हाथ बिकानी । निरदय बचन कपट के भाखे, तुम अपने जिय नैंकु न आनी । भजीं निसक आइ तुम मोकौं, गुरुजन की संका नहिं मानी । सिंह रहै जंबुक सरनागत, देखो सुनी न अकथ कहानी । सूर स्याम अंकन भरि लीन्हीँ, विरह अगिन-झर तुरत बुझानी ॥८४॥ अर्थ—कृष्ण अपने सुन्दर मुख से यह वाणी कहते है । तुम लोगो के नियम दृढ है (इसलिए) तुम धन्य हो । बिना दाम के मेरे हाथ बिक गयी । कपट से भरे निर्दय