भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला १५३ वचन हमने कहे लेकिन उसे मन में तनिक भी न लायी । गुरुजनों की शंका न मानकर तुम लोगों ने निशंक होकर मेरे पास आकर मुझे भजा । सिंह सियार की शरण में आये, ऐसी अकथ कहानी मैंने नहीं सुनी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने गोपियों को गोद मे भर लिया जिससे तुरन्त विरह अग्नि की ज्वाला बुझ गयी ॥८४॥ कियौ जिहिँ काज तप गोप नारी । देहु फल हौं तुरत लेहु तुम अब घरी, हरष चित करहु दुख देहु डारी । रास रस रचौं, मिलि संग बिलसौ, सर्वै वस्त्र हरि कहि जो निगम बानी । हँसत मुख मुख निरखि, बचन अमृत बरषि, कृपा-रस भरे सारंग पानी । ब्रज-जुवति चहुँ पास, मध्य सुदर स्याम राधिका बाम अति छवि बिराजै । सूर नव-जलद-तनु, सुभग स्यामल कांति, इंदु-बहु-पाँति-बिच अधिक छाजै॥८५॥ अर्थ—जिस कार्य के लिए अहीर की नारियों ने तप किया, मैं उसका फल देता हूँ उसे तुम लोग इस अवसर पर लो। मन प्रसन्न करो तथा दुःखों को छोड़ दो। रास के रस को रचूँगा, मेरे साथ मिलकर विलास करो, वस्त्र हरते समय जो वेद-वाणी कही थी । कृपा के रस मे भरे हुए कमलपाणि कृष्ण वचन-रुपी अमृत की वर्षा करके प्रत्येक गोपी के मुख को देख-देखकर हँसते हैं । चारों ओर ब्रज की युवतियां है, बीच मे कृष्ण है, बायी ओर राधिका है। (इस प्रकार) अत्यधिक छवि विराज रही है। सूरदास कहते हैं कि नये बादल के समान शरीर की सुन्दर साँवली कांति (कृष्ण) चन्द्रमा की बहुत सी पंक्तियों (गोपियो) के बीच अधिक शोभा दे रही है ॥८५॥ मानो माई घन घन अंतर, दामिनि । घन दामिनि दामिनि घन अंतर, शोभित हरि-ब्रज भामिनि । जमुन पुलिन मल्लिका मनोहर, सरद-सुहाई-जामिनि । सुदर ससि गुन रूप-राग-निधि, अंग-अंग अभिरामिनि । रच्यौ रास मिलि रसिक राइ सौं, मुदित भईं गुन ग्रामिनि । रूप-निधान स्याम सुंदर घन, आनँद मन बिश्रामिनि । खंजन-मीन-मयूर-हंस-पिक, भाइ-भेद गज-गामिनि । को गति गनै सूर मोहन सँग, काम विमोह्यौ कामिनि ॥८६॥ अर्थ-मानो बादल के बीच बिजली और बिजली के बीच बादल हो, इसी प्रकार कृष्ण ब्रज की स्त्रियों के बीच शोभा देते हैं। यमुना का किनारा, मनोहर मल्लिका, शरद की सुहावनी रात, सुन्दर चन्द्रमा एवं गुणरूप तथा प्रेम की राशि और अग अंग को आनंद देने वाली गोपियो ने कृष्ण के साथ रास रचाया और इससे गुण के समूहों से युक्त युवतियां प्रसन्न हो गयी। रूप के निधान अत्यन्त सुंदर कृष्ण के मन को (गोपियां) आनंद एवं विश्राम देने वाली है। खंजन, मछली, मोर, हंस, कोयल इन उपमानो को भुलाकर इस समय गोपियां गज गामिनी हैं। सूरदास कहते हैं कि मोहन के साथ होने वाली गति को कौन गिन सकता है ? कामिनियो को कामदेव ने मोहित कर लिया ॥८६॥ ८