सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ सूरसागर सार सटीक गरव भयौ ब्रजनारि कौं, तबहीँ हरि जाना । राधा प्यारी संग लिये, भए अंतर्धाना । गोपिनि हरि देख्यौ नहीं, तब सब अकुलाई । चकित होइ पूछन लगीं, कहँ गए कन्हाई । कोउ मर्म जानैँ नहीं, व्याकुल सब बाला । सूर स्याम ढूँढ़ति फिरैं, जित-तित ब्रज-बाला ॥८७॥ अर्थ—(जब) ब्रज की नारियो को गर्व हो गया तभी कृष्ण ने जान लिया । राधा प्यारी को साथ लेकर वे अन्तर्ध्यान हो गये । गोपियाँ हरि को न देखकर व्याकुल हो गयी । चकित होकर पूछने लगी कि कृष्ण कहां गये । कोई मर्म को नही जानती हैं, (इससे) सभी गोपियाँ व्याकुल है । सूरदास कहते है कि गोपियां जहां-तहां (कृष्ण) को खोजती फिरती हैं ॥८७॥ तुम कहूँ देखे स्याम बिसासी । तनक बजाइ बाँस की मुरली, लै गए प्रान निकाशी । कबहुँक आगैं, कबहुँक पाछैं, पग-पग भरति उसासी । सूर स्याम-दरसन के कारन, निकसीँ चंद-कला सी ॥८८॥ अर्थ—तुमने कही धोखेवाज कृष्ण को देखा है । तनिक बांस की वंशी बजाकर वे प्राणो को निकाल ले गये । कभी आगे कभी पीछे (गोपियां) लम्बी सांस भरती हैं । सूरदास कहते हैं कि श्याम कृष्ण के दर्शन के लिए चन्द्रमा की कला के समान वे निकल पडी ॥८८॥ कहि धौँ री बन वेलि कहूँ तैं, देखे हैं नंद-नंदन । बूझहु धौँ मालती कहूँ तैं, पाए हैं तन-चंदन । कहि धौँ कुंद, कदब, बकुल, बट, चंपक, ताल, तमाल । कहि धौँ कमल कहाँ कमलापति, सुन्दर नैन बिसाल । कहि धौँ री कुमुदिनि, कदली कछु, कहि बदरी करबीर । कहि तुलसी तुम सब जानति हौ, कहँ घनस्याम सरीर । कहि धौँ मृगी मया करि हमसौँ, कहि धौँ मधुप मराल । सूरदास-प्रभु के तुम सगी, हैं कहँ परम कृपाल ॥८६॥ अर्थ—वन की लताओं, निश्चय ही बताओ कि तुमने कृष्ण को कही देखा है । मालती तुम (तनिक) बूझो कि शरीर के लिए चन्दन के समान (कृष्ण) को तुमने कही पाया है। कुद, कदम्ब, बकुल, वट, चम्पा, ताल, तमाल तुम लोग (कृष्ण को) बताओ कहाँ है । कमल कहो लक्ष्मी के पति सुन्दर विशाल नयनो वाले कृष्ण कहाँ हैं। कुमुदिनी, कदली, बेर, कनैेर (तुम लोग) कुछ कहो । तुलसी तुम सब कुछ जानती हो, घन के समान साँवले शरीर वाले कृष्ण कहाँ है। हिरणी हमसे प्रेम करके बताओ तथा