भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ५१५ हे भ्रमर और मराल कहो कि कृष्ण कहां है। सूरदास तुम कृष्ण के साथी हो परम कृपाल कृष्ण कहां है ॥८८॥ स्याम सबनि कौं देखही, वै देखतिं नाहीँ । जहाँ तहाँ व्याकुल फिरैं, धोर न तनु माहीँ । कोउ बंसीबट कौं चली, कोउ बन घन जाहीँ । देखि भूमि वह रास की, जहँ-तहँ पग-छाहीँ । सदा हठीली, लाड़िली, कहि-कहि पछिताहीँ । नैन सजल जल ढारहीँ, व्याकुल मन माहीँ । एक-एक ह्वै ढूँढहीँ, तरुनी बिकलाहीँ । सूरज प्रभु कहुँ नहिँ मिले, ढूँढ़ति द्रुम पाहीँ ॥६०॥ अर्थ—कृष्ण सबको देखते है, लेकिन वे (गोपियां) नही देखती। जहाँ तहाँ व्याकुल होकर घूमती है, शरीर में धीरज नही है। कोई वंशीवट की ओर चली कोई घने वन में जाती हैं। वे रास की भूमि देखकर जहां तहां पग की छाया देखती हैं । (हम) सदा हठ करने वाली तथा दुलारी हैं यह कह कहकर पछताती है। नयनो से जल ढुलकाती हैं और मन से व्याकुल हैं। एक-एक करके ढूंढती है और (न पाने पर) युवतियां विकल हो जाती है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां वृक्षों के बीच ढूंढती हैं लेकिन कृष्ण मिलते नही ॥६०॥ तब नागरि जिय गर्ब बढ़ायौ । मो समान तिय और नहीँ कोउ, गिरिधर मैँ हीँ बस करि पायौ । जोइ-जोइ कहति करत पिय सोइ सोइ, मेरैँ ही हित रास उपायौ । सुन्दर, चतुर और नहिँ मोसी, देह धरै कौ भाव जनायौ । कबहुँक बैठि जाति हरि कर धरि, कबहुँ कहति मैँ अति श्रम पायौ । सूर स्याम गहि कंठ रहो तिय, कंध चढ़ी यह बचन सुनायौ ॥६१॥ अर्थ—तब राधा के मन मे (कृष्ण) ने गर्व बढ़ा दिया। वे समझती है मेरे समान कोई और स्त्री नही है। गिरिधर कृष्ण को मैंने ही वश मे किया है। जो-जो कहती हूँ कृष्ण वही-वही करते है। मेरे ही लिए (उन्होने) रास रचाया। मुझसे सुन्दर और चतुर और कोई नही है, क्योकि कृष्ण ने हमे शरीर धारण करने का भाव बता दिया। कभी कृष्ण के हाथ पकड़ कर बैठ जाती है, कभी कहती है मैंने अत्यधिक श्रम किया है। सूरदास कहते हैं कि राधा ने कृष्ण के गले से लिपट कर कहा कि मैं कन्धे पर चढ़ जाऊं ॥६१॥ कहै भामिनी कंत सौं, मोहिँ कध चढ़ावहु । नृत्य करत अति श्रम भयो, ता श्रमहिँ मिटावहु । धरनी धरत बनै नहीँ, पग अतिहिँ पिराने । तिया-बचन सुनि गर्व के, पिय मन मुसुकाने ।