सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ सूरसागर सार सटीक मैँ अविगत, अज, अकल हौँ, यह मरम न पायौ । भाव बस्य सब पैँ रहौँ, निगमनि यह गायौ । एक प्रान द्वै देह हैं, द्विविधा नहिँ यामैँ । गर्व कियौ नरदेह तैँ, मैँ रहौँ न तामैँ । सूरज-प्रभु अंतर भए, संग तैँ तजि प्यारी । जहाँ की तहँ ठाड़ी रही, वह घोष-कुमारी ॥६२॥ अर्थ—स्त्री (राधा) पति से कहती है कि मुझे कन्धे पर चढ़ाओ । नाच करते- करते अत्यधिक परिश्रम हुआ उस थकावट को मिटाओ । पैर बहुत दर्द कर रहे है (जिससे) पृथ्वी पर धरते नही बनता । स्त्री के बचन सुनकर (पति) कृष्ण मन मे मुसकाये । मैं अज्ञात, अजन्मा, तथा अकल हूँ यह मर्म (गोपियो) ने नही पाया । भाव के वश सबके साथ रहता हूँ । वेदो ने यही गाया है । (हमारे बीच) प्राण एक है तथा शरीर दो है, इसमे कोई शंका नही है । (पर) मनुष्य के शरीर से जो गर्व करते हैं मैं उसमे नही रहता । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्यारी राधा का साथ छोड़कर अंतर्ध्यान हो गये । वह अहीर की लड़की राधा जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई ॥६२॥ जो देखैँ द्रुम के तरैँ, मुरझी सुकुमारी । चकित भईँ सब सुन्दरी, वह तौ राधा री । याही कौँ खोजति सबै, यह रही कहाँ री । धाइ परीँ सब सुंदरी, जो जहाँ-तहाँ री । तन की तनकहुँ सुधि नहीँ, व्याकुल भईँ बाला । यह तौ अतिँ बेहाल है, कहुँ गए गोपाला । बार-बार बूझतिँ सबै, नहिँ बोलति बानी । सूर स्याम काहैँ तजी, कहि सब पछितानी ॥६३॥ अर्थ—जब (गोपियों ने) वृक्ष के नीचे देखा तो (उन्हे) मुरझायी हुई सुकुमारी (राधा) दिखाई पडी । सब सुन्दरियां चकित हो गयीं कि यह तो राधा है । इसे ही सब खोजते हे, यह कहां थी । जो जहां थी वहां से सब सुन्दरियां दौड पडी । शरीर की तनिक भी याद नही, बालाये व्याकुल हो गयी । यह (राधा) तो अत्यधिक बेहाल है गोपाल कही चले गये । बार वार सभी पूछती हैं लेकिन वह नही बोलती । सूरदास कहते हैं (कि गोपियां सोचती है) कृष्ण ने इसे क्यो छोड़ दिया, यह कहकर सभी पछताती है ॥६३॥ केहिँ मारग मैँ जाउँ सखी री, मारग मोहिँ बिसरचौ । ना जानौँ कित ह्वै गए मोहन, जात न जानि परचौ । अपनी पिय ढूँढ़ति फिरौँ, मोहिँ मिलिबे कौ चाव । काँटो लाग्यौ प्रेम कौ, पिय यह पायी दाव । बन डोंगर ढंढत फिरी, घर-मारग तजि गाउँ ।