भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ११७ बूझौं द्रुम, प्रति वेलि कोउ, कहै न पिय कौ नाउँ । चकित भई, चितवत फिरी, व्याकुल अतिहिं अनाथ । अब कैं जो कैसेहु मिलौं, पन्नक न त्यागौं साथ । हृदय माँझ पिय-घर करौं, नैननि बैठकि देउँ । सूरदास प्रभु सँग मिलीं, बहुरि रास-रस लेउँ ॥६४॥ अर्थ—सखी मैं किस रास्ते से जाऊँ, मुझे मार्ग भूल गया है । (मैं) नही जानती कि मोहन किधर गये, जाते समय (मुझे) जान नही पडा । मैं अपने प्रिय को ढूंढती फिरती हूँ । मुझे मिलने की इच्छा है। मुझे प्रेम का कांटा गड़ गया, ओर प्रिय को यह मोका मिला । मैं गाँव को छोड़कर वन, पहाड़ी, तथा घर के रास्ते मे ढूंढती फिरी । (मैंने) वृक्षों से पूछा, प्रत्येक लता से पूछा, लेकिन कोई प्रिय के नाम को नही कहता । इसके बाद मैं) चकित हो गयी, (मेरी) निगाह फिर गयी ओर अत्यधिक असहाय होकर व्याकुल हो गयी । अबकी वार यदि कैसे (भी) मिलेगे तो पलभर भी साथ नही छोड़ूंगी । हृदय के बीच प्रिय के लिए घर बनाऊँगी और नयनों में बैठकि दूंगी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु के साथ मिलने पर फिर से रास का रस लूंगी ॥६४॥ कृपा सिंधु हरि कृपा करौ हो । अनजानैं मन गर्व बढ़ायौ, सो जिनि हृदय धरौ हो । सोरह सहस पीर तनु एकै, राधा जिव, सब देह । ऐसी दसा देखि करुनामय, प्रगटौ हृदय-सनेह । गर्व-हत्यौ तनु विरह प्रकास्यौ, प्यारी व्याकुल जानि । सुनहु सूर अब दरसन दीजै, चूक लई इनि मानि ॥६५॥ अर्थ - कृपा के सागर कृष्ण कृपा करो । अज्ञान वश मन मे गर्व बढाया उसे हृदय में धारण मत करो । सोलह सहस गोपियां, पर सबके शरीर मे पीडा एक ही । और सब शरीर हैं, राधा ही मानो उनका प्राण है। ऐसी दशा देखकर करुणामय कृष्ण के हृदय मे स्नेह प्रकट हुआ । (कृष्ण ने गोपियों के) गर्व को समाप्त कर दिया और प्यारी को व्याकुल जानकर शरीर मे विरह प्रकाशित किया । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण सुनो, अब दर्शन दीजिए। इन लोगो ने अपनी भूल मान ली ॥६५॥ अंतर तैं हरि प्रगट भए । रहत प्रेम के वस्य कन्हाई, जुवतिनि कौं मिलि हर्ष दए । वैसोइ सुख सबकौं फिरि दीन्हीं, वहै भाव सब मानि लियौ । वै जानति हरि सग तवहिं तैं, वहै बुद्धि सब, वहै हियौ । वहै रास-मंडल-रस जानतिं, विच गोपी, विच स्याम धनी । सूर स्याम श्यामा मधि नायक, वहै परस्पर प्रीति वनी ॥६६॥ अर्थ-ओट से कृष्ण प्रकट हो गये । कृष्ण प्रेम के वश रहते हैं । (उन्होने फिर युवतियों से मिलकर) (उन्हे) आनन्द दिया । सबको वैसा ही सुख फिर से दिया और