सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ सूरसागर सार सटीक उसी भाव से सबको (अपनाकर) मान लिया। वे (गोपियाँ) हरि को पहले से ही साथ जानने लगीं। सबकी वही बुद्धि और वही हृदय (हो गया)। फिर उसी रास मण्डल के रस को समझने लगी जिसमे (श्याम के) बीच मे गोपी और (गोपी के) बीच में श्याम (थे)। सूरदास कहते हैं कि श्याम और श्यामा के मध्य नायक कृष्ण का फिर वही परस्पर प्रेम बन गया ॥६६॥ आजु हरि अद्भुत रास उपायौ। एकहिँ सुर सब मोहित कीन्हे, मुरली नाद सुनायौ। अचल चले, थकित भए, सब मुनिजन ध्यान भुलायौँ। चंचल पवन थक्यौ नहिँ डोलत, जमुना उलटि बहायौ। थकित भयौ चंद्रमा सहित-मृग, सुधा-समुद्र बढ़ायौ। सूर स्याम गोपिनि सुखदायक, लायक दरस दिखायौ ॥६७॥ अर्थ—आज कृष्ण ने अद्भुत रास रचाया। एक ही स्वर से सबको मोहित करके मुरली की ध्वनि सुनायी। (जिससे) न चलने वाले (जड) चलने लगे, चलने वाले थक गये और सब मुनि जनो का ध्यान भूल गया। चंचल पवन थककर (अब) नही डोलता है। जमुना को उल्टा वहा दिया। हिरण सहित चन्द्रमा थक गया और अमृत के समुद्र को बढ़ा दिया। सूरदास कहते है गोपियो को सुख देने वाले कृष्ण ने सत्पात्र को दर्शन दिया ॥६७॥ बनावत रास मंडल प्यारौ। मुकुट की लटक, झलक कुंडल की, निरतत नंद दुलारो। उर वनमाल सोह सुंदर वर, गोपिनि कैँ सँग गावै। लेत उपज नागर नागरि सँग, बिच-बिच तान सुनावै। वंसीबट-तट रास रच्यौ है, सब गोपिनि सुखकारौ। सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन सौँ, भक्तनि प्रान अधारौ ॥६८॥ अर्थ—कृष्ण प्यारे रास मण्डल को बनाते हैं। मुकुट को झुकाते हुए, कुण्डल को झलकाते हुए, नन्द के दुलारे (कृष्ण) नाचते हैं। वक्ष स्थल पर श्रेष्ठ सुन्दर बनमाल सुशोभित है, (और कृष्ण) गोपियो के साथ गाते हैं। कृष्ण राधा के साथ नया स्वर भरते है, और बीच-बीच मे तान सुनाते है। सब गोपियो को सुख देने वाला रास (कृष्ण ने) वंसीवट के निकट रचा है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु, तुमसे मिलने की आशा ही भक्तो के प्राण का आधार है ॥६८॥ रास रस स्रमित भईँ ब्रजवाल। निसि सुख दै यमुना-तट लै गए, भोर भयौ तिहिँ काल। मनकामना भई परिपूरन, रही न एकौ साधि। षोड़स सहस नारि सँग मोहन, कीन्हौ सुख अवगाधि।