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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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को ही अपना एक मात्र सहारा मानते थे। वास्तविकता यह है कि महाकवि की प्रारम्भिक जीवनी के प्रामाणिक विस्तार उपलब्ध नही है। उत्तरार्ध जीवनी से सम्वद्ध चौरासी वार्ता के उल्लेखों को प्रामाणिक माना जा सकता है। किन्तु ये जीवनी सम्बन्धी कोई विस्तार नही देते थे। महाकवि सूरदास की रचनाओ मे सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध रचना 'सूरसागर' है। अन्य समस्त रचनाएँ अत्यन्त गौण हैं। 'सूरसारावली' ११०७ पदों का खंडकाव्य सा है, जिसमें भागवत् की कथा को ही संक्षिप्त वर्णनात्मक रूप मे दिया गया है। इसमे कोई काव्य सम्बन्धी सौन्दर्य भी नही है। 'साहित्य लहरी' ११८ कूट पदों का संग्रह है, जिसमे किसी अलंकार, नायिका या भाव का उल्लेख करके कूट शैली मे उनके उदाहरण दिये गये है। अधिकांश आलोचक इन दोनों ग्रंथों को सूरकृत मानते हैं, यद्यपि कुछ विद्वान् इस सम्वन्ध मे संदिग्ध भी हैं। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्ट मे सूरदास के नाम से लगभग १०, १२ अन्य ग्रन्थों के नाम मिलते हैं, जैसे व्याहलो, पदसंग्रह, दशमस्कंध, टीका, नागलीला, भागवत, सूर-पचीसी, गोवर्द्धनलीला, सूरसागर सार, रामजन्म, एकादशी माहात्म्य आदि; जिनमें कुछ प्रकाशित भी हो चुके हैं। इन ग्रंथों मे कुछ तो कदाचित् महाकवि सूरदास की रचनाएँ नही हैं और सूरसागर मे ही विशेष कथाओ अथवा लीलाओ से सम्वद्ध पदो के संग्रह मात्र हैं। इस प्रकार महाकवि की एकमात्र प्रामाणिक और महत्वपूर्ण रचना सूरसागर ही रह जाती है। सूरदास की हस्तलिखित पोथियों की दो परम्पराएँ मिलती है। एक मे श्रीकृष्ण के केवल ब्रजचरित सम्बन्धी पदों का लीला-क्रम के अनुसार संकलन है। सूरसागर की यह परम्परा कदाचित् अधिक प्राचीन है। नवल किशोर प्रेस का सूरसागर इसी परम्परा की पोथियो के आधार पर प्रकाशित किया गया था। सूरसागर की दूसरी परम्परा मे पदो तथा खंडकाव्यो के रूप प्राप्त महाकवि की लगभग समस्त रचनाओं को एकत्रित तथा श्रीमद्भागवत के द्वादशस्कंधी क्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया गया था। यह परम्परा वेंकटेश्वर प्रेस तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करणों से मिलती है। सूरसागर की इस परम्परा मे भी श्रीकृष्ण के ब्रजलीला सम्बन्धी पद ही प्रधान हैं। भागवत् के अन्य स्कंधो से सम्बन्धित सामग्री अत्यन्त संक्षिप्त है तथा काव्य-स्तर की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है द्वादशस्कंधी सूरसागर की निम्नलिखित विषय-सूची से यह स्थिति स्पष्ट हो जायेगी :- स्कंध विषय पद संख्या १. व्यास अवतार (१), विनयपद (२२३) ३४३ २. चौबीस अवतारो की सूची ३८ ३. सनकादि, (२) वाराह, (३) तथा कपिलदेव, (४) अवतार १३