सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ११ ] ४ दत्तात्रेय, (५) यज्ञपुरुष, (६) हरि अथवा ध्रुववरदेन, (७) तथा पृथु (८) अवतार १३ ५ ऋषभदेव (६) ४ ६. अजामिल उद्धार अवतार (१०) ८ ७. नृसिंह (११), नारद (१२) ५ ८. गजमोचन (१३), कूर्म (१४), धन्वन्तरि (१५) वामन (१६), तथा मत्स्य (१७), अवतार १७ ६. राम (१८), परशुराम (१६) १७४ १०. कृष्ण अवतार (२०) ४१६० पूर्वार्ध : ब्रजचरित उत्तरार्ध : द्वारिका चरित - १४६ ११. नारायण (२१), हंस (२२) ४ १२. बुद्ध (२३), कल्कि (२४) ५ ४८३६ ऊपर चौबीस अवतारों की सूची में दस मुख्य अवतार मोटे टाइप में दिये गए हैं। इस प्रकार सूरसागर की इस परम्परा के लगभग ५००० पदों मे ४००० से अधिक पद श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओं से सम्बद्ध हैं, तथा शेष १००० पदों में श्रीकृष्ण का द्वारिका चरित, विनय पद, राम अवतार सम्बन्धी पद तथा २२ अवतारो का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन है। यहाँ इस बात का उल्लेख कर देना भी अनुचित न होगा कि सूरदास ने लगभग सवा लाख पद लिखे थे, इस किंवदंती का कोई भी प्रामाणिक आधार नही है। कवि की पद-रचना पांच छह हज़ार पदो के बीच ही रही होगी, जो लगभग प्राप्त है। वास्तव मे यह संख्या भी कम नही है। जैसा ऊपर की सूची से स्पष्ट है, द्वादशस्कंधी परम्परा के सूरसागर में दशम स्कंध के पदसमूह के बाद अधिक संख्या मे प्रथम स्कंध के विनयपद तथा नवम-स्कंध के राम-अवतार सम्बन्धी पद पाए जाते है। विनयपदों मे दास्य भक्ति तथा दैन्य भावना प्रधान है। बहुत संभव है कि इस पद समूह में कवि की कुछ प्रारम्भिक रचनाएँ हो, जब वे गऊघाट पर रहते थे और महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्पर्क में नही आए थे, तथा कुछ की प्रौढ शैली को देखकर ऐसा मालूम होता है कि वे कवि की वृद्धावस्था की रचनाएँ होनी चाहिए। रामावतार का विस्तृत वर्णन होना स्वाभाविक है क्योंकि कृष्णावतार के अतिरिक्त भगवान् के अवतारों में यह मुख्य है। सूरदास ने द्वारिकावासी श्रीकृष्ण का चरित भी बहुत संक्षेप मे ही दिया है। आकार तथा स्तर दोनों ही दृष्टि-कोणो से यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओ के गान में ही कवि की वास्तविक अभिरुचि थी। इसमें संदेह नही कि सूरसागर मे वर्णित श्रीकृष्ण की लीलाओं का मूलाधार