भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१२० सूरसागर सार सटीक ब्रज-जुवती रस-रास पगीँ । कियौ स्याम सब को मन भायो, निसि रति-रंग जगीँ । पूरन ब्रह्म, अकल, अविनासी, सबनि सग सुख दीन्ही । जितनी नारि भेष भए तितने, भेद न काहू कीन्ही । वह सुख टरत न काहूँ मन तैँ, पति हित-साध पुराईँ । सूर स्याम दूलह सब दुलहिनि, निसि भाँवरि दै आईं ॥१०२॥ अर्थ - ब्रज युवतियां रास के रस मे पगी रही । कृष्ण (के द्वारा) किया गया (रास) सब के मन को अच्छा लगा । (वे) रात भर रति के रङ्ग मे जागती रही । पूर्ण ब्रह्म, अकल, अविनाशी, कृष्ण ने सब को साथ सुख दिया । जितनी स्त्रियां थी, कृष्ण ने उतने ही वेष बनाये, किसी के साथ भेद-भाव नही किया । वह सुख किसी के मन से टलता नही है । उन्होने (कृष्ण के लिए) पति प्रेम की इच्छा पूर्ण कर ली । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण दूल्हा तथा (सब गोपियां) दुल्हिनियां रात मे भांवर दे आईं ॥१०२॥ रास रस लीला गाइ सुनाऊँ । यह जस कहै, सुनै मुख श्रवननि, तिहि चरननि सिर नाऊँ । कहा कहौँ वक्ता स्रोता फल, इक रसना क्यौँ गाऊँ । अष्ट सिद्धि नवनिधि सुख-सपति, लघुता करि दरसाऊँ । जौ परतीति होइ हिरदै मैंँ, जग-माया धिक देखै । हरि-जन दरस हरिहि सम बूझै, अंतर कपट न लेखै । धनि वक्ता, तेई धन स्रोता, स्याम निकट हैं ताकैं । सूर धन्य तिहि के पितु, माता, भाव भगति है जाकैं ॥१०३॥ अर्थ - रास के रस की लीला को गाकर सुनाता हूँ । यह यश जो मुंह से कहता और सुनता है उसके चरणो पर सिर झुका दूं । कहने वाले और सुनने वाले के फल को कहाँ तक कहूँ और इस एक जीभ से क्यो गाऊँ । आठो सिद्धियां और नौ निधियों के सुख सम्पत्ति को ( इस रास रस के सामने ) हीन करके दिखा दूँ । यदि हृदय मे विश्वास हो तो ससार की माया को देखना धिक्कार है । भगवान् के भक्त का दर्शन भगवान् के समान ही समझते हुए हृदय मे कपट नही रखे । वह वक्ता धन्य है और वही श्रोता धन्य है और उसी के निकट कृष्ण हैं । सूरदास कहते हैं कि उसी के माता- पिता धन्य हैं जिनमे भक्ति भाव है ॥१०३॥ पनघट लीला पनघट रोके रहत कन्हाई । जमुना-जल कोउ भरन न पावै, देखत हीँ फिरि जाई । तबहिँ स्याम इक बुद्धि उपाई, आपुन रहे छपाई ।