सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १२१ तट ठाढे जे सखा संग के, तिनकौं लियौ बुलाई। बैठारयौ ग्वालनि कौं द्रुमतर, आपुन फिरि-फिरि देखत। बड़ी वार भई कोउ न आई, सूर स्याम मन लेखत ॥१५०४॥ अर्थ—कृष्ण पनघट को रोके रहते है। यमुना में कोई जल भरने नही पाता और (कृष्ण को देखते ही) सब वापस फिर जाती हैं। तभी कृष्ण को एक उपाय सूझा और उन्होंने अपने को छिपा लिया। तट पर जो मित्र खड़े थे उन्हें बुला लिया। ग्वालों को वृक्ष के नीचे बैठा दिया और स्वयं घूम-घूम कर देखते हैं। बैठे-बैठे देर हो गई लेकिन कोई (गोपी) नही आई जिससे कृष्ण मन में सोचते हैं ॥१५०४॥ जुवति इक आवति देखी स्याम। द्रुम कैं ओट रहै हरि आपुन, जमुना तट गई बाम। जल हलोरि गागरि भरि नागरि, जबहीं सीस उठायो। घर कौं चली जाइ ता पाछैं, सिर तैं घट ढरकायो। चतुर ग्वालि कर गह्यो स्याम कौ, कनक लकुटिया पाई। औरनि सौं करि रहे अचगरी, मोसौँ लगत कन्हाई। गागरि लै हँसि देत ग्वारि-कर, रीतौ घट नहिं लैहौँ। सूर स्याम ह्वाँ आनि देहु भरि, तबहिँ लकुट कर दैहौं ॥१५०५॥ अर्थ—एक युवती को आते हुए कृष्ण ने देखा। कृष्ण स्वयं वृक्ष की ओट में (छिपे) रहे और वह युवती यमुना के तट पर गयी। जल हिलोर कर गगरी भर कर जब स्त्री ने सिर पर उठाया और (जैसे ही) घर की ओर चली, (कृष्ण ने) पीछे से जाकर सिर से घड़ा ढरका दिया। चतुर ग्वालिन ने कृष्ण के हाथ को पकड़ा और सोने की लकुटी पा गयी। (ग्वालिन बोली) कृष्ण औरों से शरारत करते रहे मुझसे (क्यों) लगते हो। (कृष्ण) हंसकर खाली घड़ा ग्वालिन को देते है, (लेकिन वह कहती है) मैं खाली घड़ा नही लूंगी। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण इसे भर कर लाओ तभी लकुटी दूंगी ॥१५०५॥ घट भरि दियौ स्याम उठाइ। नैंकु तन की सुधि न ताकौं, चली ब्रज-समुहाइ। स्याम सुन्दर नैन-भीतर, रहे आनि समाइ। जहाँ-तहँ भरि दृष्टि देखै, तहाँ-तहाँ कन्हाइ। उतहिं तैं इक सखी आई, कहति कहा भुलाइ। सूर अबहीं हँसत आई, चली कहाँ गवाँइ ॥१५०६॥ अर्थ—कृष्ण ने घड़ा उठाकर भर दिया। उसे तनिक भी शरीर का ख्याल नही और ब्रज की ओर चली। श्याम सुन्दर नयनों के भीतर आकर समा गये। जहाँ-जहाँ निगाह भर कर देखती है तहाँ-तहाँ कृष्ण ही दिखाई देते हैं। उस तरफ से एक सखी