सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ सूरसागर सार सटीक आयी ओर कहती है कि (तुम) कैसे भूली हुई हो। सूरदास कहते हैं कि (सखी पूछती है) अभी तो तुम हँसती हुई आयी, कहाँ (मन) गवांकर चली जा रही हो ॥१०६॥ नौकैं देहु न मेरी गिंडुरी । लै जैहैं धरि जसुमति आगैं, आवहु री सब मिलि झुंडरी । काहूनहीं डरात कन्हाई, वाट घाट तुम करत अचगरी । जमुना-दह गिंडुरी फटकारी, फोरी सब मटुकी अरु गगरी । भली करी यह कुंवर कन्हाई, आजु मेटिहैं तुम्हरी लंगरी । चलीं सूर जसुमति के आगैं, उरहन लै ब्रज-तरुनी सगरी ॥१०७॥ अर्थ—(गोपियां कहती है) ठीक है तुम हमारी गिंडुरी मत दो । तुम्हे पकड़कर यशोदा के आगे ले चलूंगी। आओ (सखियो) सब झुंड बनाकर चले । कृष्ण किसी से नही डरते, घाट तथा रास्ते में शरारत करते है। यमुना के दह मे गिंडुरी फेक दी, और मटकी तथा गगरी को फोड दिया । कुंवर कृष्ण तुमने अच्छा किया । आज तुम्हारी दुष्टता मिटा दूंगी । सूरदास कहते हैं कि सभी ब्रज की तरुणियां यशोदा के आगे शिकायत करने चली ॥१०७॥ सुनहु महरि तेरौ लाड़िलौ, अति करत अचगरी । जमुन भरन जल हम गईँ, तहँ रोकत डगरी । सिरतैं नीर ढराइ दै, फोरी सब गगरी । गेँडुरि दई फटकारि कै, हरि करत जु लंगरी । नित प्रति ऐसे ढंग करै, हमसौँ कहै धगरी । अब बस-वास बनैं, नहिं इहिँ तुव ब्रज-नगरी । आपु गयौ चढ़ि कदम पर, चितवत रहौँ सगरी । सूर स्याम ऐसेंहि सदा, हम सौं करै झगरी ॥१०८॥ अर्थ—(गोपियां कहती है) महरि सुनो तुम्हारा लाड़ला बहुत शरारत करता है । हम यमुना मे जल भरने गयी थी वहां (हमारी) राह रोकता था । सिर से पानी ढुलकाकर सब घडे फोड डाले । गेडुरी फेक दी, (इस प्रकार) कृष्ण शरारत करते हैं। नित्य प्रति ऐसा ही ढङ्ग अपनाते है और हमे कुलटा कहते हैं। तुम्हारी इस ब्रज नगरी में अब बसना-सहना नही बनता । स्वय कदम्ब पर चढ गये और (हम) सब देखती रही। सूरदास कहते हैं कि हम (गोपियो) से ऐसे हमेशा झगडा करते है ॥१०८॥ ब्रज-घर-घर यह बात चलावत । जसुमति कौ सुत करत अचगरी, जमुना जल कोउ भरन न पावत । स्याम वरन नटवर बपु काछे, मुरली राग मलार बजावत । कुंडल-छबि रबि किरनहुँ तैं दुति, मुकुट इंद्र-धनुहुँ तैं भावत । मानत काहु न करत अचगरी, गागरि धरि जल मुंह ढरकावत । सूर स्याम कौं मात पिता दोउ, ऐसे ढंग आपुनहिं पढ़ावत ॥१०६॥