भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला १२३ अर्थ—ब्रज के ( निवासी ) घर-घर यह बात चलाते हैं कि यशोदा का पुत्र दुष्टता करता है जिससे कोई यमुना में जल भरने नही पाता । श्याम वर्ण के (कृष्ण) नटवर का रूप सँवार कर मुरली से मलार राग बजाते है । कुंडल की छवि सूर्य की किरण से भी तेज, मुकुट इन्द्र-धनुष से भी (अधिक) अच्छा लगता है । किसी का कहना न मानकर (वे) शरारत करते हैं । गगरी को पकड़ कर मुंह से जल ढलका देते हैं । सूरदास कहते हैं कि (ब्रजवासी कहते हैं) कृष्ण के माता-पिता ऐसे ढङ्ग स्वयं (कृष्ण को) पढ़ाते हैं ॥११०६॥ करत अचगरी नंद महर कौ । सखा लिये जमुना तट बैठ्यो, निबह न लोग डगर कौ । कोउ खीझो, कोऊ बिन बरजौ, जुवतिन कैं मन ध्यान । मन-बच-कर्म स्याम सुन्दर तजि, और न जानति आन । यह लीला सब स्याम करत हैं, ब्रज-जुवतिन कैं हेत । सूर भजे जिहिं भाव कृष्ण कौं, ताकौं, सोइ फल देत ॥११०॥ अर्थ—महर नन्द के (पुत्र) शरारत करते रहते हैं । मित्रों को लेकर यमुना के तट पर बैठ गये हैं जिससे लोगों को रास्ते मे निवाह नही है । कोई (चाहे) खीझे, कोई (चाहे) रोके, युवतियो के मन मे (कृष्ण का गहरा) ध्यान है । मन, वाणी तथा कर्म से कृष्ण को छोड़कर और किसी को नही जानती । यह सब लीला ब्रज की युवतियों के लिए (ही) कृष्ण करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को जो जिस भाव से भजता है उसे वैसा ही फल देते हैं ॥११०॥ दान लीला ऐसी दान माँगिये नहिं जौ, हम पैं दियौ न जाइ । बन मैं पाइ अकेली जुवतिनि, मारग रोकत धाइ । घाट बाट औघट जमुना-तट, बातें कहत बनाइ । कोऊ ऐसी दान लेत है, कौनैं पठाए सिखाइ । हम जानतिं तुम यौँ नहिं रहौ, रहिहौ गारी खाइ । जो रस चाहौ सो रस नाहीँ, गोरस पियौ अघाइ । औरनि सौं लै लीजै मोहन, तब हम देहिं बुलाइ । सूर स्याम कत करत अचगरी, हम सौं कुँवर कन्हाइ ॥१११॥ अर्थ—(गोपियां कहती हैं) ऐसा दान मत मांगिये जो हमसे दिया न जा सके । वन में युवतियों को अकेली पाकर दौड़कर (कृष्ण) रास्ता रोकते हो । घाट, रास्ते दुर्गम पथ तथा यमुना के तट पर बनाकर बातें कहते हो । कोई ऐसा दान लेता है (लगता है तुम्हे) किसी ने सिखाकर भेजा है । हम जानते है कि तुम ऐसे नहीं रहोगे बल्कि गाली खाकर ही रहोगे । जो रस चाहते हो वह रस नही है, गोरस भरपेट पी सकते हो । मोहन औरों से ले लीजिए तब हम बुलाकर दे देगी । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां कहती है) हे कुंवर कृष्ण हमसे दुष्टता क्यो करते हो ॥१११॥