सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १२५ एक तो तुम स्त्री. हो, दूसरे मूर्खा भी भली भांति हो भला संसार मे इनके समान कौन है। सूरदास कहते है अभी सब छुड़ा लेंगे तो दौड़ी-दौड़ी फिरोगी ॥११४॥ हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । जाइ चढ़ी तुम सघन द्रुमनि पर, जहँ तहँ रहौ छपाई । तब लौँ बैठि रहौ मुख मूंदे, जब जानहु सब आई । कूदि परौ तब द्रुमनि-द्रुमनि तैं, दै दै नंद दुहाई । चकित होहिं जैसैं जुवती-गन, डरनि जाहिं अकुलाई । बेनु-विषाण-मुरलि-धुन कीजौ, संख-सब्द गहनाई । नित प्रति जाति हमारै मारग, यह कहियौ समुझाई । सूर स्याम माखनदधि दानी, यह सुधि नाहिँ न पाई ? ॥११५॥ अर्थ -- हँसते हुए मित्रो से कृष्ण यह कहते है । तुम जाकर घने वृक्षो पर चढ़कर जहां-तहां छिप रहो । तब तक मुंह मूंद कर बैठे रहो और जब जानो कि सब (गोपियां) आ गई तब पेड-पेड़ से नन्द की दुहाई देकर कूद पड़ो । जैसे युवतियों का समूह चकित और आकुल होकर डर से घबरा जाय तो बंशी, विषाण, मुरली की ध्वनि करना और शंख का गहन शब्द करना । नित्य प्रति (तुम लोग) हमारे मार्ग से जाती हो यह समझा कर कहना । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण माखन और दही के दानी हैं क्या यह खबर नहीं है ॥११५॥ ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन । मोर मुकुट पीताम्बर काछे, खौरि किए तन चंदन । तब यह कह्यौ कहाँ अब जैहौ, आगैँ कुँवर कन्हाई । यह सुनि मन आनन्द बढ़ायौ, मुख कहैं, बात डराई । कोउ-कोउ कहति चलौ री जैये, कोउ कहै घर फिरि जैये । कोउ-कोउ कहति कहा करिहैं हरि, इनसौँ कहा परैयै । कोउ-कोउ कहति कालिहीँ हमकौँ, लूटि लई नंद लाल । सूर स्याम के ऐसे गुन हैं, घरहिँ फिरौ ब्रज-बाल । ११६०। अर्थ - ग्वालिनो ने जब कृष्ण को देखा जो मोर मुकुट तथा पीताम्बर से सजे थे तथा शरीर पर चन्दन का लेप किये थे तो कहा कि अब कहाँ जायेगे, आगे कुंवर कृष्ण हैं। यह सुनकर मन मे आनन्द बढ़ गया और मुख से डरती हुई बात कहती है । कोई कोई कहती हैं (आगे) चली चलो । कोई कहती है घर वापस चलिये ! कोई कहती है कृष्ण क्या करेगे इनसे कैसे भागा जाय । कोई कहती है कि कल ही हमको कृष्ण ने लूट लिया था। सूरदास कहते है कि कृष्ण के ऐसे ही गुण है इसलिए ब्रज- बालाएँ घर की ओर वापस चली गई ॥११६॥ कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? लैहौँ छीनि दूध दधि माखन, देखति ही तुम रैहौ ।