सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ सूरसागर सार सटीक सब दिन की भरि लेउँ आजुहीं, तब छाड़ी, मैं तुमकौ। उघटति हो तुम मातु-पिता लौं, नहिं जानत हो हमकौ। हम जानति हैं तुमकौ मोहन, लै-लै गोद खिलाए। सूर स्याम अब भये जगाती, वै दिन सब विसराए ॥११७॥ अर्थ—कृष्ण कहते हैं कि (यदि) तुम दही का दान नहीं दोगी तो दूध, दही, मक्खन छीन लूंगा (तुम) देखती ही रह जाओगी। सब दिन (की कमी) आज ही पूरी कर लूंगा तब मैं तुमको छोड़ूँगा। तुम माता-पिता तक को बुरा-भला कहती हो (लेकिन) मुझे जानती नहीं हो। (गोपियाँ कहती हैं) हम मोहन तुमको जानती हैं तुम्हें गोद मे लेकर खिलाया है। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) अब तुम कर उगाहने वाले हो गये हो, उन दिनो को भुला दिया ॥११७॥ जाइ सबै कंसहि गुहरावहु। दधि माखन घृत लेत छुड़ाए, आजु हजूर बुलावहु। ऐसे कौं कहि मोहिं बतावति, पल भीतर गहि मारौं। मथुरापतिहिं सुनौगी तुमहीं, जब धरि केस पछारौं। बार-बार दिन हमहिं बतावति, अपनौ दिन न विचार्यौ। सूर इन्द्र ब्रज जबहिं बहावत, तब गिरि राखि उबार्यौ ॥११८॥ अर्थ—जाकर तुम सब लोग कंस को गुहारो। दही, माखन, घी, छुड़ाए लेते हैं; आज हुज़ूर को बुलाओ। ऐसे आदमी को मुझसे कहकर बताती हो जिसे पल भर मे मार डालूं। तुम ही सुनोगी जब मथुरा पति को बाल पकड़कर पछाड़ूँगा। बार- बार हमसे दिन बताती हो अपना दिन नहीं विचारती। सूरदास कहते हैं कि जब इन्द्र ने ब्रज को बहाना चाहा तब मैंने (कृष्ण ने) गिरि के द्वारा रक्षा की थी ॥११८॥ मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी। इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसों कहौं उघारी। कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी। जोइ मन करै सोइ करि डारैं, मूँड़ चढ़त हैं भारी। बात कहत अँठिलाति जाति सब, हँसति देति कर तारी। सूर कहा ये हमकौँ जानैँ, छाँछहिँ बेंचैनहारी ॥११९॥ अर्थ—हे ब्रज की नारियो मुझसे (एक) बात सुनो। तीनो लोकों में एक उपाख्यान (कहावत) चलता है उसे उघाड़कर कहता हूँ। कभी बालक तथा स्त्री को मुंह नही लगाना चाहिए। जो (ये) करना चाहे वही कर डाले तो सिर पर सवार हो जाते हैं। बात कहने पर (गोपियाँ) हँसती, ताली देती ओर अठिलाती चली जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण कहते हैं) ये छाछ बेचने वाली स्त्रियां हमको क्या जाने ॥११९॥