भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 359 में से

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पृष्ठ 128

[वृन्दावन लीला ५२७ यह जानति तुम नंदमहर-सुत । धेनु दुहत तुमकौं हम देखतिं, जबहिं जाति खरिकहिं उत । चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर-घर ढूँढ़त भाँड़े। मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छाँड़े। और सुनौ जसुमति जब बांधे, हम कियौ सहाइ । सूरदास-प्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥१२०॥ अर्थ—यह जानती है कि तुम नन्द महर के पुत्र हो। तुमको गाय दुहते हुए हम देखते है जब भी गायो के रहने के स्थान से होकर जाती हैं। फिर यह जानती है कि तुम चोरी करते हो और घर-घर बर्तन ढूंढते फिरते हो। अब दानी होकर मार्ग रोकने लगे हो। उन कार्यों (ढगो) को कब से छोड़ दिया। और सुनो, यशोदा जब बांधती थी तब हम ही सहायक होती थी। सूरदास कहते है कि (हम गोपी) यह जानती हैं कि तुम कृष्ण ब्रज मे रहते हो ॥१२०॥ को माता को पिता हमारैं । कब जनमत हमकौं तुम देख्यौ, हँसियत बचन तुम्हारैं । कब माखन चोरी करि खायौ, कब बाँधे महतारी । दुहत कौन गैया चारत, बात कहो यह भारी । तुम जानत मोहिं नंद-दुठौना, नंद कहाँ तैं आए । मैं पूरन अविगत, अविनासी, माया सबनि भुलाए । यह सुनि ग्वालि सबै मुसुक्यानी, ऐसे गुन हौ जानत । सूर स्याम जो निदर्यौ सबही, मात-पिता नहिं मानत ॥१२१॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी कौन माता है और कौन पिता है। हमको कब जन्मते देखा, तुम्हारी बातो पर हँसी आती है।—कब माखन चुराकर खाया, कब माता ने हमे बांधा। किसकी गाय दुहता और चराता हूँ, तुमने यह बडी बात कही। तुम मुझे नन्द का पुत्र समझती हो लेकिन नन्द कहां से आये। मैं पूर्ण, अविगत, अविनाशी (हूँ) माया से सभी भूले हैं। यह सुनकर सभी ग्वालिने मुसकायी, ऐसे गुण को हम जानती हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) जो सबका निरादर करता है तथा माता-पिता को नही मानता (ऐसे तुम्हे जानती हूँ) ॥१२१॥ भक्त हेत अवतार धरौं । कर्म-धर्म कैं वस मैं नाहीं, जोग जज्ञ मन मैं न करौं । दीन-गुहारि सुनौं श्रवननि भरि, गर्व-वचनसुनि हृदय जरौं । भाव-अधीन रहौं सबही कै, और न काहू नैंकु डरौं । ब्रह्मा कीट आदि लौं व्यापक, सबकौं सुख दै दुखहिं हरौं । सूर स्याम तब कही प्रगटही, जहाँ भाव तहँ तैं न टरौं ॥१२२॥

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