सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ सूरसागर सार सटीक अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) भक्त के लिए अवतार धरता हूँ । धर्म-कर्म के वश में नही रहता हूँ । योग और यज्ञ को मन में (धारण) नही करता । दीन की पुकार को कान भर के सुनता हूँ । गर्व के वचन सुनकर हृदय से जल जाता हूँ । सब के (भक्ति) भाव के अधीन रहता हूँ, और किसी से तनिक भी नही डरता । ब्रह्मा से लेकर कीट तक व्याप्त हूँ, सब को सुख देकर दुःख को हरता हूँ । सूरदास कहते हैं तब कृष्ण ने प्रत्यक्ष ही (सब कुछ कहा) कि जहाँ भाव है वहाँ से मै नही टलता ॥१२२॥ जौ तुमहीं हौ सबके राजा। तौ बैठौ सिहासन चढ़ि कै, चँवर, छत्र, सिर भ्राजा । मोर-मुकुट, मुरली पीतावर, छाड़ी नटवर-साजा । वेनु, विषाण, सख क्यों पूरत, वाजै नौवत वाजा। यह जु सुनैं हमहूँ सुख पावैं, सग करैं कछु काजा । सूर स्याम ऐसी बातैं सुनि, हमकौं आवति लाजा ॥१२३॥ अर्थ—(गोपियां कहती हैं) जब तुम ही सब के राजा हो तो सिहासन पर चढ़कर बैठो, ओर सिर पर चंवर तथा छत्र सुशोभित हो । मोर-मुकुट, मुरली, पीताम्बर और नटवर के वेश को छोड़ दो । बंशी, विषाण शंख क्यों बजाते हो, नौवत बजे । यह जो सुने तो हम भी सुख पाये, और साथ मे कुछ काम करें । सूरदास कहते है कि यह बाते सुनकर हमको लज्जा आती है ॥१२३॥ हमहिं और सो रोकै कौन । रोकनहारौ नदमहर सुत, कान्ह नाम जाकौ है तौन । जाकैं वल है कामनृपति कौ, ठगत फिरत जुवतिनि कौं जोन । टोना डारि देत सिर ऊपर, आपु रहत ठाढ़ौ ह्वै मौन । सुनहु स्याम ऐसी न बूझियै, वानि परी तुमकौं यह कौन । सूरदास-प्रभु कृपा करहु अब, कैसेंहु जाहिं अपनै भौन ॥१२४॥ अर्थ - (गोपियां कहती हैं) हमको और कौन रोक सकता है । रोकने वाले वही महर नन्द के पुत्र हैं, जिनका नाम कृष्ण है । जिनके पास राजा के समान काम करने का बल है, जो युवतियो को ठगते फिरते है । सिर के ऊपर टोना डालकर स्वयं मौन होकर खडे रहते है । हे कृष्ण सुनो समझ मे नही आता कि तुम्हारी यह कौन सी आदत पड़ गयी है । हे कृष्ण अब कृपा करो किसी प्रकार हम अपने घर जायें ॥१२४॥ राधा सौं माखन हरि माँगत । औरनि की मटुकी कौ खायौ, तुम्हरौ कैसी लागत । लै आई वृषभानु-सुता, हँसि, सद लवनो है मेरौ । लै दीन्हौ अपनैं कर हरि-मुख, खात अल्प हँसि हेरौ । सबहिनि तैं मीठौ दधि है यह, मधुरैं कह्यौ सुनाइ । सूरदास-प्रभु सुख उपजायौ, ब्रज ललना मनभाइ ॥१२५॥