सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १३५ अर्थ—(गोपी कहती है) कृष्ण पर मेरा मन रीझ गया है (अब) कोई क्या करेगा। मैं तो चरण रूपी कमल से लिपट गयी जो होना हो सो हो। (चाहे) पिता नाराज हो जायें, घर में माता मारे, तथा पराये लोग हँसी करे। अब तो कृष्ण से प्रेम बढ गया है। ब्रह्मा ने यह संयोग रचा है। मेरी जाति की प्रतिष्ठा तथा लाज (भले ही) न रहे तथा मेरा परलोक नष्ट हो जाय (फिर भी) मैं (पति) कृष्ण को तनिक भी छोड़ नहीं सकती। (मैं उनसे) नगाड़ा बजाकर (घोषित करके) मिली हूँ। फिर यह तन कहाँ धर पाऊँगी ओर बनवारी कृष्ण फिर कहाँ मिलेंगे। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण के ऊपर (मैं) यह शरीर न्योछावर करती हूँ ॥१४१॥ करन दै लोगनि कौं उपहास । मन क्रम वचन नद-नंदन कौ, नैंकु न छाड़ौँ पास। सब या ब्रज के लोग चिकनियां, मेरे भाएँ घास। अब तौ यहै बसी री माई, नहिं मानौँ गुरु त्रास। कैसेँ रह्यौ परै री सजनी, एक गाँव कै बास। स्याम मिलन की प्रीति सखी री, जानत सूरजदास ॥१४२॥ अर्थ—(गोपी कहती है) लोगो को हँसी करने दो। मन, कर्म तथा वचन से कृष्ण की निकटता तनिक भी नही छोड़ सकती। इस ब्रज के सब लोग छैला हैं ! (लेकिन) मेरी बुद्धि से (सब) घास है (नगण्य है)। अब तो यही (कृष्ण) मन में बस गये हैं। (अब) गुरुजनो का भय नही मानती हूँ। एक ही गाँव का निवास (बिना मिलन के) कैसे रहा जा सकता है। हे सखी, कृष्ण से मिलने की प्रीति को सूरदास (जैसे भक्त ही) जानते हैं ॥१४२॥ एक गाउँ कै वास बसौ हौँ, कैसेँ धीर धरौँ । लोचन-मधुप अटक नहिं मानत, जद्यपि जतन करौँ। वै इहिं मग नित प्रति आवत हैं, हौँ दधि लै निकरौँ। पुलकित रोम-रोम, गदगद सुर, आनँद उमंग भरौँ। पर अन्तर चलि जात, कलप बर, बिरहा अनल जरौँ। सूर सकुच कुल-कानि कहाँ लगि, आरज-पथहिँ डरौँ ॥१४३॥ अर्थ—हे सखी एक ही गाँव का बास (होते हुए) मैं कैसे धीरज धरूँ। (मेरे) आंख रूपी भौंरे प्रयत्न करने पर भी रोक नही मानते। वे इसी मार्ग से रोज आते हैं, मैं दही लेकर निकलती हूँ। (देखकर मेरे) रोम-रोम पुलकित हो जाते है आवाज गद्गद् हो जाती है तथा (मैं) आनन्द तथा उमग से भर जाती हूँ। (क्षण भर) ओट मे चले जाने पर एक कल्प से भी अधिक (जान पडने वाले समय की कल्पना से) विरह की अग्नि में जलती हूँ। सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) संकोच, कुल की मर्यादा तथा श्रेष्ठ पथ से कहाँ तक डरूँ ॥१४३॥