सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ सूरसागर सार सटीक हौं संग साँवरे के जैहौँ । होनी होइ होइ सो अबहीँ, जस अपजस काहूँ न डरैहौँ । कहा रिसाइ करे कोउ मेरौ, कछु जो कहै प्रान तिहिँ दैहौँ । दैहौँ त्यागि राखिहौँ यह व्रत, हरि-रति बीज बहुरि कब वैहौँ । का यह ब्रज-बापी क्रीड़ा जल, भजि नंद-नंद सबै सुख लैहौँ ॥१४४॥ अर्थ—मैं कृष्ण के साथ जाऊँगी । जो होना हो अभी हो जाय । यश-अपयश किसी को नही डरूँगी । कोई नाराज होकर मेरा क्या कर सकता है ? अगर कोई कुछ कहता है तो उस पर प्राण दे दूँगी । शरीर को त्याग कर भी यह व्रत रखूँगी । कृष्ण के प्रेम के बीज को फिर कब बोऊँगी ? सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) यह नश्वर पृथ्वी (कृष्ण-सुख की तुलना मे) क्या है, (मैं तो उस सुख के लिए) शरीर को भी त्याग कर प्रिय कृष्ण के भवन आकाश मे समा जाऊँगी । (उस सुख के बिना) ब्रज- सरोवर की जल-क्रीड़ा का भी आनन्द नगण्य है। अतः नन्द नन्दन (कृष्ण) को भजकर सब सुख पाऊँगी ॥१४४॥ रूप-वर्णन देखौ माई सुन्दरता कौ सागर । बुधि-विवेक बल पार न पावत, मगन होत मन नागर । तनु अति स्याम अगाध अंबु-निधि, कटि पट पीत तरंग । चितवत चलत अधिक रुचि उपजत, भँवर परति सब अंग । नैन-मीन, मकराकृत कुडल, भुज सरि सुभग भुजंग । मुक्ता-माला मिलीँ मानौ द्वै, सुरसरि एकै संग । कनक खचित मनिमय आभूषण, मुख, श्रम-कन सुख देत । जनु जल-निधि मथि प्रकट कियौ ससि, श्री अरु सुधा समेत । देखि सरूप सकल गोपी जन, रहीं विचारि-विचारि । तदपि सूर तरि सकीँ न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि ॥१४५॥ अर्थ— (गोपी कहती है) सखी, सुन्दरता के सागर कृष्ण को देखो । बुद्धि तथा विवेक के बल से चतुर मन पार न पाकर इसमे डूब जाता है । अत्यधिक साँवलापन गहरा जलनिधि है, कमर का पीला वस्त्र तरङ्ग के समान है। देखते हुए जब चलते हैं तो अधिक रुचि पैदा होती है और सब अङ्ग मे भँवर (निगाह) पड़ जाते हैं। नेत्र मछली (के समान) है, मगर के आकार का कुडल (मगर) है । भुजाये सुन्दर सांप के समान हैं । मुक्ता की माला इस प्रकार मिली है जैसे दो गङ्गा (एक साथ मिली हो) । सोने से जडे हुए मणिमय आभूषण हैं, मुख पर श्रम से उत्पन्न पसीना सुख देता है, मानो समुद्र को मथकर चन्द्रमा को लक्ष्मी तथा अमृत के साथ निकाला हो । सुन्दर रूप को देख कर सभी गोपियां सोच-सोच कर रह जाती हैं। सूरदास कहते है कि वे शोभा (के सागर) को तर नही सकीं। प्रेम मे अधिक परिश्रम से हार कर रह गयी ॥१४५॥