भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

१३८ सूरसागर सार सटीक मैँ बलि जाउँ ललित ठोड़ी पर, वलि मोतिन की माल । सूर निरखि तन-मन बलिहारौँ, बलि बलि जसुमति-लाल ॥१४८॥ अर्थ - मैं कृष्ण के मुख की शोभा पर वलि जाती हूँ। विखरे हुए कुटिल बालों पर वलि जाती हूँ। भौह तथा मस्तक पर न्यौछावर होती हूँ। सुन्दर चितवन पर बलि जाती हूँ। कुंडल के प्रकाश पर बलि जाती हूँ। सुन्दर नासिका पर न्यौछावर होती हूँ। उसकी छवि की बलिहारी है। मूँगा और बिम्बाफल को लज्जित करने वाले लाल अधरों पर बलि जाती हूँ। मैं कृष्ण के दाँतो की चमक पर बलिहारी हूँ। उस पर सावन की बिजली को न्योछावर करती हूँ। मैं सुन्दर ठोढी तथा मोतियों की माला पर बलि जाती हूँ। सूरदास कहते है कि मैं गोपी (कृष्ण) को देखकर तन मन सब की बलि देती हूँ। हे यशोदा के लाल (तुम पर) निछावर हूँ ॥१४८॥ नटवर वेप धरे ब्रज आवत । मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, कुटिल अलक मुख पर छवि पावत । भृकुटी बिकट नैन अति चंचल, इहिँ छविपर उपमा इक धावत । धनुष देखि खंजन विधि डरपत, उड़ि न सकत उड़िबौ अकुलावत । अधर अनूप मुरलि-सुर पूरत, गौरी राग अलापि बजावत । सुरभी-वृन्द गोप-बालक-सँग, गावत अति आनन्द बढावत । कनक-मेखला कटि पीतांवर, निर्तत मन्द-मन्द सुर गावत । सूर-स्याम-प्रति-अंग-माधुरी, निरखत ब्रज-जन कैँ मन भावत ॥१४६॥ अर्थ—कृष्ण नटवर का वेष धर कर ब्रज आते हैं। (सिर पर) मोर का मुकुट, (कान मे) मकर के आकार का कुंडल, घुंघराले बाल मुख पर शोभा पाते हैं। (उनकी) भौह विकट (वक्र) तथा नेत्र चंचल हैं। इस पर एक उपमा (मन मे) आती है जैसे धनुष को देखकर खंजन का एक जोडा डर कर उड़ना चाहता हो पर उड न पाने से आकुल हो । ओठ अनुपम ओर मुरली के स्वर से पूर्ण है तथा गौरी राग को अलाप कर बजाते हैं। गायो तथा गोप बालको के साथ गाते हुए वे अत्यधिक आनन्द बढाते हैं। कमर मे सोने की करधनी ओर पीताम्बर शोभित है नाचते हुए मन्द-मन्द सुर से गाते हैं। सूरदास कहते है कि कृष्ण के प्रत्येक अंग की मधुरता को देखकर ब्रज के लोगों का मन भा जाता है ॥१४६॥ आवत मोहन धेनु चराए। मोर मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुट गोरज लपटाए । कटि काछनी किंकनि-धुनि बाजनि, चरन चलत नूपुर रव लाए । ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीत बसन दामिनिहिँ लजाए। गोप सखा आवत गुन गावत, मध्य स्याम हलधर छवि छाए। सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाए ॥१५०॥ अर्थ-मोहन गाय चराकर आ रहे है। सिर पर मोर का मुकुट, वक्ष स्थल