सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १३६ पर वन माला, हाथ में लाठी और गायों से उड़ायी गयी धूल शोभित है। कमर में पहनी गयी कछनी और उस पर किंकिणि की ध्वनि बजती है। चलते समय चरणो से नूपुर की ध्वनि होती है। ग्वालों की मंडली के बीच कृष्ण अपने पीताम्बर से बिजली को लजाते है। गोप मिल कर गुण गाते हुए आते हैं। बीच में बलभद्र और कृष्ण की शोभा छायी है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने असुरों का संहार किया और मन के हर्ष को बढ़ाते हुए ब्रज आते हैं ॥१५१॥ उपमा हरि-तनु देखि लजानी । कोउ जल मैंँ, कोउ बननि रहीँ दुरि, कोउ कोउ गगन समानी । मुख निरखत ससि गयौ अम्बर कौँ, तड़ित दसन-छवि हेरि । मीन कमल कर-चरन नयन डर, जल मैंँ कियौ बसेरि । भुजा देखि अहिराज लजाने, बिबरन पैठे धाइ । कटि निरखत केहरि डर मान्यौ, बन-बन रहे दुराइ । गारी देहिँ कबिनि कैँ बरनत, श्री-अँग पटतर देत । सूरदास हमकौँ सरमावत, नाउँ हमारौ लेत ॥१५१॥ अर्थ-कृष्ण के शरीर को देखकर (सारी) उपमाये लजा गयीं । कोई जल में, कोई वन में छिपी रही, कोई-कोई आकाश में समा गयी। मुख को देखकर चन्द्रमा आकाश मे चला गया और दांतो को देखकर बिजली (आकाश मे चली गयी) । नेत्रो के डर से मीन, हाथ तथा चरणो के डर से कमलो ने पानी मे जाकर बसेरा लिया। भुजा को देखकर सर्पों के राजा (शेषनाग) लजाकर बिल मे जाकर बैठ गये । कमर को देखकर सिंह ने डर माना और वन-वन छिपता रहा । अङ्ग शोभा की समता करते समय कवियों को (उपमान) गाली देते है । और वे कहते है कि हमारी चर्चा करके हमें (कविगण) लज्जित करते है । १५१॥ स्याम सुख-रासि, रस-रासि भारी । रूप की रासि, गुन-रासि, जोबन-रासि, थकित भईँ निरखि नव तरुन नारी । सील की रासि, जस-रासि, आनंद रासि, नील नव-जलद छवि वरनकारी । दया की रासि, विद्या-रासि, बल-रासि, निर्दयारति दनुकुल-प्रहारी । चतुराई-रासि, छल-रासि, कल-रासि, हरि भजैँ जिहिँ हेत तिहिँ देन हारी । सूर-प्रभु स्याम सुख-धाम पूरन काम, वसन-कटि-पीत मुख मुरलीधारी॥१५२॥ अर्थ-कृष्ण सुख की और रस की भारी राशि (हैं) । (कृष्ण के) रूप की राशि, गुण की राशि, यौवन की राशि को देखकर तरुणी नारियां थकित हो गयीं । (कृष्ण) शील की राशि, यश की राशि, आनन्द की राशि हैं तथा नीले नये बादल के समान शोभा वाले है । (वे) दया की राशि, विद्या की राशि, बल की राशि हैं, शत्रुओं के लिए निर्दयी तथा राक्षसो का नाश करने वाले हैं। चतुरता की राशि, छल की राशि, कला की राशि कृष्ण को जिस हेतु भेजा जाता है उसी को पूरा करते हैं ।