सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० सूरसागर सार सटीक सूरदास कहते हैं कृष्ण सुख के धाम तथा इच्छा को पूरा करने वाले, कमर में पीतांबर और मुँह में मुरली धारण करने वाले हैं ॥१५२॥ स्याम-कमल-पद-नख की सोभा । जे नख-चंद्र इन्द्र-सर परसे, सिव विरंचि मन लोभा । जे नख-चंद्र सनक मुनि ध्यावत, नहिं पावत भरमाहीं । ते नख-चंद्र प्रकट ब्रज-जुवती, निरखि निरखि हरषाहीं । जे नख-चंद्र फनिंद-हृदय तैं, एकौ निमिष न टारत । जे नख-चंद्र महामुनि नारद, पलक न कहूँ विसारत । जे नख-चंद्र-भजन खल नासत, रमा हृदय जे परसति । सूर स्याम-नख-चंद्र विमल छवि, गोपीजन मिलि दरसति ॥१५३॥ अर्थ- कृष्ण के कमल के समान चरणों के नखों की शोभा (अनुपम) है। जिन नख रूपी चन्द्रों को इन्द्र ने सिर से स्पर्श किया, और जिन नख-रूपी चन्द्रों की सनक मुनि ध्यान धरते हैं और (उन्हें) न पाकर भरमते हैं। वही नख रूपी चन्द्रमा प्रकट (हुआ) देख-देखकर ब्रज की युवतियां हर्षित होती हैं। जिन नख-चन्द्रो को शेषनाग अपने हृदय से एक भी क्षण नही हटाते । जिन नख चन्द्रों को महा मुनि नारद पल भर भी नही बिसारते हैं। जो नख-चन्द्र भजन करने पर दुष्टो का नाश करते हैं, और लक्ष्मी के हृदय का स्पर्श करते है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां मिलकर कृष्ण के नख रूपी चन्द्र की शोभा को देखती हैं ॥१५३॥ स्याम-हृदय जल-सुत की माला, अतिहिं अनूपम छाजै (री) । मनहुँ बलाकपाँति नवधन पर, यह उपमा कछु भ्राजै (री) । पीत, हरित, सित, अरुन मालवन, राजति हृदय विसाल(री) । मानहुँ इन्द्रधनुष नभमंडल, प्रगट भयौ तिहिं काल (री) । भृगु पद-चिन्ह उरस्थल प्रगटे, कौस्तुभ मनि ढिग दरसत (री) । बैठे मानौ षट बिधु एक सँग, अर्द्ध निसा मिलि हरषत (री) । भुजा बिसाल स्याम सुन्दर की, चन्दन खौरि चढ़ाये (री) । सूर सुभग अँग-अँग की सोभा, ब्रज-ललना ललचाए (री) ॥१५४॥ अर्थ - कृष्ण के हृदय पर मोती की माला अत्यधिक अनुपम शोभा (देती) है। मानो नये बादलों पर बगुलो की पंक्ति हो, यह उपमा कुछ उचित लगती है। पीली, हरी, सफेद, लाल वनमाला विशाल हृदय पर शोभित है। मानो उस समय आकाश मंडल मे इन्द्र धनुष उदित हो । भृगु के पैरो के (प्रहार) का चिह्न वक्ष स्थल पर स्पष्ट है और उसके निकट ही कौस्तुभ मणि दिखाई पडती है। मानो आधी रात मे छह चन्द्रमा (पांचो अंगुलियो से युक्त चरम चिह्न एवं कौस्तुभ-मणि) बैठे हुए मिलकर प्रसन्न हो रहे है। कृष्ण की भुजा चन्दन का लेप किए विलसित है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के अङ्ग-अङ्ग की शोभा ब्रज की स्त्रियो को ललचा देने वाली है ॥१५४॥