भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१४२ सूरसागर सार सटीक इसका कोई वार-पार नहीं है । इन (कृष्ण) की शोभा की भी कोई सीमा नहीं है । सूरदास कहते हैं कि (गोपियों के) नेत्र त्रिवेणी होकर अपार समुद्र (रूपी कृष्ण) से मिल गये ॥१५६॥ इन नैननि मोहिं बहुत सतायाँ । अब लौं कानि करी मैं सजनी, बहुते मूँढ़ चढ़ायाँ । निदरे रहत गहे रिस मोसों, मोहिं दोष लगायी । लूटत आपुन श्री-अँग-सोभा, ज्यों निधनी धन पायाँ । निसिहूँ दिन ये करत अचगरी, मनहिँ कहा धीँ आयी । सुनहु सूर इनकी प्रतिपालत, आलस नैंकु न लायी ॥१५७॥ अर्थ—इन नैनों ने मुझे बहुत सताया । अब तक हे सखी मैंने मर्यादा रखी, (इन्हें) बहुत सिर पर चढ़ाया । (लेकिन अब) ये मुझसे क्रोध करके रूठे रहते हैं और हम को ही दोष लगाते हैं । स्वयं सुन्दर अंगों की शोभा को लूटते हैं जैसे निर्धन को धन मिल गया हो । रात-दिन ये शरारत करते हैं (न मालूम) इनके मन को क्या हो गया है (क्या समा गया है) । (गोपी कहती है) सूरदास सुनो इनका पालन करते हुए मैं तनिक भी आलस नहीं लायी ॥१५७॥ नैन करैं सुख, हम दुख पावैं । ऐसो को पर-वेद न जानै, जासों कहि जु सुनावैं । तातैं मौन भलौ सबही तें, कहि कै मान गँवावैं । लोचन, मन, इंद्री हरि कीं भजि, तजि हमकोँ सुख पावैं । ये तो गए आपने कर तैं, वृथा जीव भरमावैं । सूर स्याम हैं चतुर सिरोमनि, तिनसों भेद जनावैं ॥१५८॥ अर्थ—आंखें सुख करती हैं और हम दुःख पाते हैं । ऐसा कौन है जो दूसरे के दुःख को समझे, जिससे (अपना दुख) कहकर सुनाऊँ । सबसे अच्छा है मौन रहना, कह कर कौन आदर गँवाये । आंख, मन, इन्द्रियां कृष्ण के होकर हमको छोड़कर सुख पाते हैं । ये तो अपने हाथ से निकल गये अब जीव को व्यर्थ ही भरमाते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण चतुर शिरोमणि हैं, उनसे (ये सब) (गोपियो का) भेद जानते हैं ॥१५८॥ ऐसे आपु स्वारथी नैन । अपनौइ पेट भरत हैं निसि-दिन, और न लैन न दैन । वस्तु अपार परी ओछैं कर, ये जानत घटि जैहैं । को इनसे समझाइ कहै यह, दीन्हें ही अधिकैहैं । सदा नहीं रैहैं अधिकारी, नाऊँ राखि जी लेते । सूर स्याम सुख लूटैं आपुन, औरनि हूँ कौं देते ॥१५९॥ अर्थ—ये नेत्र स्वयं कितने स्वार्थी हैं । रात-दिन अपना ही पेट भरते रहते हैं और (से कुछ उनका) लेना-देना नहीं है । अपार वस्तु नीच के हाथ पड़ गई है, ये समझते हैं कि घट जायेगी । कौन इनसे समझाकर कहे कि देने से अधिकाई ही होगी ।