सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदा अधिकारी नहीं रहेंगे जो (चाहें तो) नाम रख लें। सूरदास कहते हैं कि औरो को भी देते हुए स्वयं सुख लूटे ॥१५८॥ नैन भए बस मोहन तैं। ज्यौँ कुरंग बस होत नाद के, टरत नहीं ता गोहन तैं। ज्यौँ मधुकर बस कमल-कोस के, ज्यौँ बस चंद चकोर । तैसेहि ये बस भए स्याम के, गुड़ी-वस्य ज्यौँ डोर । ज्यौँ बस स्वाँति-बूँद कै चातक, ज्यौँ बस जल के मीन । सूरज-प्रभु के बस्य भए ये, छिनु-छिनु प्रीति नवीन ॥१६०॥ अर्थ—नैन मोहन के वश मे हो गये । जैसे मृग नाद के वश में होकर उसके पास से नही टलता । जैसे भौंरा कमल की कली के वश में होता है और चकोर पक्षी चन्द्रमा के (वश मे होता है) । वैसे ही ये कृष्ण के वश मे हो गये हैं, जैसे पतंग डोरी के वश में रहती है। जैसे स्वाती नक्षत्र की बूंद के वश में पपीहा और जल के वश मे मछली उसी तरह ये कृष्ण के वश मे हो गये और क्षण-क्षण नयी प्रीति (का अनुभव) करते हैं ॥१६०॥ तब तैं नैन रहे इकटकहीं । जब तैं दृष्टि परे नँद-नंदन, नैंकु न अत मटकहीँ । मुरली घरे अरुन अधरनि पर, कुडल झलक कपोल । निरखत इकटक पलक भुलाने, मनौँ बिकाने मोल । हमकौँ वै काहैँ न बिसारैं, अपनी सुधि उन नाहिं । सूर स्याम- छवि-सिंधु सामने, वृथा तरुनि पछिताहिं ॥१६१॥ अर्थ—तब से नेत्र एकटक ही हैं, जब से कृष्ण पर नजर पडी (तब से) तनिक भी अन्यत्र नही हिलते । लाल ओठो पर मुरली घरे हुए, कपोल पर झलकते कुण्डल वाले (कृष्ण) को पलक भांजना भूलकर एकटक देख रहे हैं मानो कीमत पर बिक गये है। हमको वे क्यो न भुला दे जबकि उन्हे अपनी ही सुध नही है। सूरदास कहते है कि कृष्ण के शोभा-समुद्र मे (ये नेत्र) समा गये हैं, युवतियाँ व्यर्थ ही पछताती हैं ॥१६१॥ नैननि सौँ झगरौ करिहौँ री । कहा भयौ जौ स्याम-संग हैं, बाँह पकरि सम्मुख लरिहौँ री । जन्महिं तैं प्रतिपालि बड़े किये, दिन-दिन कौ लेखौ करिहौँ री । रूप-लूट कीन्ही तुम काहैँ, अपने बाँटे कौँ धरिहौँ री । एक मातु पितु भवन एक रहे, मैं काहैँ उनकौँ डरिहौँ री । सूर अंस जौ नहीँ देहिंगे, उनकेँ रँग मैं हूँ ढरिहौँ री ॥१६२॥ अर्थ—आंखों से झगड़ा करूंगी। क्या हुआ जो वे कृष्ण के साथ हैं। बांह पकड़कर सामने लडूंगी । जन्म से पालकर वड़ा किया है, उनसे एक-एक दिन का हिसाब करूंगी। (कृष्ण) के रूप को लूट कर तुमने अपना क्यो कर लिया (उनसे)