भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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१४४ सूरसागर सार सटीक अपना हिस्सा धरा लूंगी। एक ही माता पिता तथा एक ही भवन में निवास रहा (इसलिए) मैं उन (नेत्रो) को क्यों डरूँगी। सूरदास कहते हैं कि मुझ (गोपी) को यदि हिस्सा नही देगे तो उनके रंग में मैं ढल जाऊँगी ॥१६२॥ कपटी नैननि तैँ कोउ नाहीँ। घर कौ भेद और के आगैँ, क्यों कहिवे कौँ जाहीँ। आपु गए निधरक ह्वै हमतेँ, वरजि-वरजि पचिहारी। मनकाँमना भई परिपूरन, ढरि रीझे गिरिधारी। इनहिँ विना वे, उनहिँ विना ये, अंतर नाहीँ भावत। सूरदास यह जुग की महिमा, कुटिल तुरत फल पावत ॥१६३॥ अर्थ- नैनों से (अधिक) छली कोई नही है। दूसरे के आगे घर का भेद कहने क्यो जाते हैं। स्वयं बेधड़क होकर चले गये, रोक-रोककर हार गयी। इनकी मनो- कामना पूरी हो गयी जो कि ढलकर कृष्ण इनसे रीझ गये। इनके बिना वे (कृष्ण) और उनके बिना ये (नेत्र) दोनो को वियोग नही अच्छा लगता। सूरदास कहते हैं कि यह युग की महिमा है कि कुटिल व्यक्ति, तुरन्त फल पाता है ॥१६३॥ नैना घूँघट मैँ न समात। सुन्दर वदन नन्द-नन्दन को, निरखि-निरखि न अघात। अति रस लुब्ध महा मधु लम्पट, जानत एक न वात। कहा कहौं दरसन-मुख माते, ओट भएँ अकुलात। वार-वार वरजत हाँ हारी, तऊ टेव नहिं जात। सूर तनक गिरिधर विनु देखै, पलक कलप सम जात ॥१६४॥ अर्थ-नेत्र घूंघट मे नही समाते। कृष्ण के सुन्दर शरीर को देख-देखकर नही अघाते हैं। (कृष्ण के रूप के) रस-माधुर्य के अत्यधिक लोभी ये लंपट एक भी वात नही जानते। क्या कहूँ दर्शन के सुख से मतवाले (कृष्ण से) ओट होने पर आकुल हो जाते हैं। वार-वार रोककर हार गयी तब भी आदत नही छूटती। सूरदास कहते हैं कि पल भर बिना देखे उन्हे एक कल्प के समान बीतता है ॥१६४॥ ये नैना मेरे ढीठ भए री। घूँघट-ओट रहत नहिँ रोकैँ, हरि-मुख देखत लोभि गए री। जउ मैं कोटि जतन करि राखे, पलक-कपाटनि मूंदि लए री। तउ ते उमँगि चले दोउ हठ करि, करौं कहा मैं जान दए री। अतिहिँ चपल, वरज्यौ नहिँ मानत, देखि वदन तन फेरि नए री। सूर स्यामसुंदर-रस अटके, मानहुँ लोभी उहँह छाए री ॥१६५॥ अर्थ-ये मेरे नेत्र धृष्ट हो गये हैं। घूंघट की ओट मे रोकने से नही रहते, कृष्ण के रूप को देखते ही ललचा गये। यद्यपि मैंने सैकडो उपाय करके रखा और पलक रूपी किवाड़ को वन्द कर लिया, तब भी वे दोनो हठ करके उमगकर चले, क्या करूँ,