सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १५५ मैंने जाने दिया। अत्यधिक चंचल हैं, रोक-टोक नहीं मानते, (कृष्ण के) शरीर को देख कर उधर ही झुक पड़ते हैं। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) ये कृष्ण के (रूप) रस में उलझ गये, मानो ये लोभी वहीं ही छा गये हैं ॥१६५॥ अँखियाँ हरि कैं हाथ बिकानीँ । मृदु मुसुकानि मोल इनि लीन्ही, यह सुनि सुनि पछितानीँ । कैसैँ रहति रहीँ मेरैँ बस, अब कछु औरै भाँति । अब वै लाज मरतिँ मोहिँ देखत, बैठीँ मिलि हरि-पाँति । सपने की सी मिलनि करति हैं, कब आवतिँ कब जातिँ । सूर मिलौँ ढरि नंद-नन्दन कौँ, अनत नहींँ पतियातिँ ॥१६६॥ अर्थ—आंखे कृष्ण के हाथ बिक गयी। मीठी हंसी ने इन्हे मोल ले लिया, यह सुन-सुनकर पछताती हूँ। मेरे वश मे कैसे रहती थी, अब तो कुछ और ही तरह का व्यवहार है। अब वे कृष्ण की पंक्ति में बैठी हुई मुझे देखकर लाज के मारे मरती हैं, स्वप्न के समान मिलन करती हैं। (मालूम नही) कब आती और कब जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के साथ प्रेम करके अब ये अन्यत्र विश्वास नही करती ॥१६६॥ अँखियन तब तैँ बैर धरयौ । जब हम हटकी हरि-दरसन कौँ, सो रिस नहिँ बिसरयौ । तबहीँ तैँ उनि हमहिँ भुलायौ, गईँ उतहिँ कौँ धाइ । अब तौ तरकि तरकि ऐंठति हैं; लेनी लेतिँ बनाइ । भईँ जाइ वै स्याम-सुहागिनि, बड़भागिनि कहवावैँ । सूरदास वैसी प्रभुता तजि, हम पै कब वै आवैँ ॥१६७॥ अर्थ—आंखो ने तब से शत्रुता ठान ली है जब से कृष्ण के दर्शन से उन्हे रोका, (और उस) क्रोध को (उन्होने) भुलाया नही। तब ही से उन्होने हमे भुला दिया, और उन्ही की ओर दौड़कर चली गयी। तब ही से तड़क-तड़क कर ऐंठती है, और लेनी (बदला) बना ले रही हैं। वे जाकर कृष्ण की सुहागिन होकर वडभागी कहलाती हैं। सूरदास कहते हैं कि वैसी बड़ाई को छोड़कर हमारे पास वे क्यों आने लगी ॥१६७॥ १०