सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
वृन्दावन लीला १५५ मैंने जाने दिया। अत्यधिक चंचल हैं, रोक-टोक नहीं मानते, (कृष्ण के) शरीर को देख कर उधर ही झुक पड़ते हैं। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) ये कृष्ण के (रूप) रस में उलझ गये, मानो ये लोभी वहीं ही छा गये हैं ॥१६५॥ अँखियाँ हरि कैं हाथ बिकानीँ । मृदु मुसुकानि मोल इनि लीन्ही, यह सुनि सुनि पछितानीँ । कैसैँ रहति रहीँ मेरैँ बस, अब कछु औरै भाँति । अब वै लाज मरतिँ मोहिँ देखत, बैठीँ मिलि हरि-पाँति । सपने की सी मिलनि करति हैं, कब आवतिँ कब जातिँ । सूर मिलौँ ढरि नंद-नन्दन कौँ, अनत नहींँ पतियातिँ ॥१६६॥ अर्थ—आंखे कृष्ण के हाथ बिक गयी। मीठी हंसी ने इन्हे मोल ले लिया, यह सुन-सुनकर पछताती हूँ। मेरे वश मे कैसे रहती थी, अब तो कुछ और ही तरह का व्यवहार है। अब वे कृष्ण की पंक्ति में बैठी हुई मुझे देखकर लाज के मारे मरती हैं, स्वप्न के समान मिलन करती हैं। (मालूम नही) कब आती और कब जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के साथ प्रेम करके अब ये अन्यत्र विश्वास नही करती ॥१६६॥ अँखियन तब तैँ बैर धरयौ । जब हम हटकी हरि-दरसन कौँ, सो रिस नहिँ बिसरयौ । तबहीँ तैँ उनि हमहिँ भुलायौ, गईँ उतहिँ कौँ धाइ । अब तौ तरकि तरकि ऐंठति हैं; लेनी लेतिँ बनाइ । भईँ जाइ वै स्याम-सुहागिनि, बड़भागिनि कहवावैँ । सूरदास वैसी प्रभुता तजि, हम पै कब वै आवैँ ॥१६७॥ अर्थ—आंखो ने तब से शत्रुता ठान ली है जब से कृष्ण के दर्शन से उन्हे रोका, (और उस) क्रोध को (उन्होने) भुलाया नही। तब ही से उन्होने हमे भुला दिया, और उन्ही की ओर दौड़कर चली गयी। तब ही से तड़क-तड़क कर ऐंठती है, और लेनी (बदला) बना ले रही हैं। वे जाकर कृष्ण की सुहागिन होकर वडभागी कहलाती हैं। सूरदास कहते हैं कि वैसी बड़ाई को छोड़कर हमारे पास वे क्यों आने लगी ॥१६७॥ १०
राधा-कृष्ण प्रथम मिलन खेलत हरि निकसे ब्रज-खोरी । कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा, चक, डोरी । मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि वर, दसन-दमक दामिनि-छवि छोरी । गए स्याम रबि-तनया कैँ तट, अंग लसति चन्दन की खोरी । औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दियेँ रोरी । नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी । संग लरिकिनी चली इत आवति, दिन-थोरी, अति छवि तन-गोरी । सूर स्याम देखत हीँ रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥१॥ अर्थ—खेलते हुए कृष्ण ब्रज की सँकरी गली मे निकले, कमर में कछनी और पीताम्बर बांधे हुए हैं और हाथ मे भौंरा (लट्टू) और लट्टू की डोरी लिए हुए हैं। उनके (मस्तक पर) मोर का मुकुट है, कानो में श्रेष्ठ कुण्डल है और उनके दांतो की चमक ने बिजली की छवि को छीन लिया है। कृष्ण यमुना के तट पर गये, उनके अंग पर चंदन का लेप शोभित है। उन्होने अचानक ही वहां राधा को देखा, जिसके नेत्र बड़े-बड़े थे तथा मस्तक पर तिलक लगा था, जिसने नीला वस्त्र तथा कमर में घांघरी पहन रखी थी। जिसके पीठ पर झकझोरती हुई चोटी हिलती डुलती है। वह लडकियों के साथ इधर ही चली आती है। वह थोडे दिन (कम उम्र) की (होते हुए भी), अत्यधिक सुन्दर तथा गोरे शरीर की है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (उसे) देखते ही रीझ गये। नेत्र से नेत्र मिलते ही जादू का सा असर हुआ ॥१॥ बूझत स्याम कौन तू गोरी । कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी नहींँ कहूँ ब्रज खोरी । काहे कौँ हम ब्रज-तन आवतिँ, खेलति रहतिँ अपनी पौरी । सुनत रहतिँ स्रवननि नँद-ढोटा,करत फिरत माखन-दधि-चोरी । तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैँ, खेलन चलौ संग मिलि जोरी । सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ॥२॥ अर्थ-कृष्ण (राधा) से पूछते है-गोरी तुम कौन हो। कहाँ रहती हो और किसकी बेटी हो, (क्योकि) तुम्हें ब्रज की गलियो मे कभी नही देखता हूँ। (राधा उत्तर देती है) मैं ब्रज में किसलिए आऊँ, (मैं) अपने द्वार पर खेलती रहती हूँ। माखन तथा
राधाकृष्ण १४७ दधी की चोरी करते फिरते हुए नन्द के पुत्र (कृष्ण) की कहानी सुनती रहती हूँ। (कृष्ण कहते हैं) मैं तुम्हारा क्या चुरा लूंगा, साथ मिलकर खेलने चलें। सूरदास कहते हैं कि रसिक शिरोमनि कृष्ण ने भोली राधा को बातो से ही फुसला लिया ॥२॥ प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ। नैन नैन कीन्ही सब बातैँ, गुप्त प्रीति प्रगटान्योँ। खेलन कबहुँ हमारैं आवहु, नंद-सदन, ब्रज गाउँ। द्वारैं आइ टेरि मोहिँ लीजौ, कान्ह हमारौ नाउँ। जौ कहियै घर दूरि तुम्हारौ, बोलत सुनियै टेरि। तुमहिँ सौँह वृषभानु बबा की, प्रात-साँझ इक फेरि। सूधो निपट देखियत तुमकौँ, तातैँ करियत साथ। सूर स्याम नागर-उत नागरि, राधा दोउ मिलि गाथ ॥३॥ अर्थ--प्रथम प्रेम को दोनों ने मन से ही जान लिया। (दोनों ने) आंख ही आंख से सब बाते कर ली और गुप्त प्रेम को प्रकट किया। (कृष्ण कहते हैं) कभी हमारे ब्रज गांव के नन्द के घर खेलने आओ। द्वार पर आकर मुझे बुला लेना, कृष्ण मेरा नाम है। जो कहो कि तुम्हारा घर दूर है, तुम्हारे (जोर से) पुकारने पर सुनाई देगा। तुम्हे वृषभानु बाबा की सौगन्ध है, सुबह या शाम एक बार (अवश्य) आना। तुम्हे बिलकुल सीधी-सरल देख कर मैं तुम्हारा साथ करना चाहता हूँ। सूरदास कहते हैं कि श्याम कृष्ण नागर (सभ्य तथा चतुर पुरुष) तथा राधा नागरि (सभ्य तथा चतुर नारी) है, दोनो मिल कर लीला करते है ॥३॥ गई वृषभानु-सुता अपने घर। सग सखी सौँ कहति चली यह, को जैहैँ इनकैँ दर। बड़ी बेर भई जमुना आए, खीझति ह्वैहै मैया। वचन कहति मुख, हृदय-प्रेम-दुख, मन हरि लियौ कन्हैया। माता कहति कहाँ री प्यारी, कहाँ अबेर लगाई। सूरदास तब कहति राधिका, खरिक देखि हौँ आई ॥४॥ अर्थ-वृषभानु की पुत्री (राधा) अपने घर गयी। साथ की सखियों से यह कहती हुई चली कि कौन इनके (कृष्ण) घर जायेगा। यमुना आए हुए बहुत देर हो गयी। माता खीझती होंगी। मुंह से यह वचन कहती है, (किन्तु) हृदय मे प्रेम की पीड़ा है, (क्योंकि) कृष्ण ने उसका मन हर लिया। माता कहती हैं-प्यारी तुम अब तक कहाँ थी, कहाँ देर लगायी। सूरदास कहते है कि तब राधा ने अपनी मां को उत्तर दिया-कि मैं पशुओं का वाड़ा देखकर आई हूँ ॥४॥ नंद गए खरिकहिँ हरि लीन्हे। देखी तहाँ राधिका ठाढ़ी, बोलि लिए तिहिँ चीन्हे।
१४८ सूरसागर सार सटीक महर कह्यौ खेलौ तुम दोऊ, दूरि कहूँ जिनि जैहौ । गनती करत ग्वाल गैयनि की, मोहिं नियरैं तुम रैहौ । सुनि बेटी बृषभानु महर की, कान्हहिं लेइ खिलाइ । सूर स्याम कौं देखे रहिहौ, मारै जनि कोउ गाइ ॥५॥ अर्थ-नन्द कृष्ण को लेकर पशुओ के बाड़े (गोशाला) में गये । वहां पर उन्होने राधिका को खड़ी देखा, उसे पहचान कर (नन्द ने) बुला लिया । महर ने कहा तुम दोनों खेलो, कही दूर मत जाना । ग्वाल और गायों की गिनती करते हुए मेरे ही पास तुम रहना । महर वृषभानु की बेटी सुनो ! कृष्ण को खिला लो । सूरदास कहते हैं (महर कहते हैं) कि कृष्ण को देखते रहना, कोई गाय मारने न पावे ॥५॥ नन्द बबा की बात सुनौ हरि । मोहिं छोड़ि जौ कहूँ जाहुगे, ल्याऊँगी तुमकौं धरि । भली भई तुम्हें सौंपि गए मोहिं, जान न दैहौं तुमकौं । बाँह तुम्हारी नैंकु न छाँड़ौं, महर खीझिहैं हमकौं । मेरी बाँह छोड़ि दै राधा, करत ऊपरफट बातें । सूर स्याम नागर, नागरि सौं, करत प्रेम की घातें ॥६॥ अर्थ- (राधा कहती है) कृष्ण, बाबा नन्द की बात सुनो । मुझको छोड़कर यदि कही जाओगे तो मै तुमको पकड़ लाऊँगी । अच्छा हुआ तुम्हे वे मुझे सौप गये, मैं तुमको जाने नही दूंगी । तुम्हारी बांह तनिक भी नही छोड़ेंगी, नही तो महर हमसे नाराज होंगे । (कृष्ण कहते हैं) राधा मेरी बांह छोड़ दे, क्यों अनर्गल बाते करती है। सूरदास कहते है कृष्ण चतुर राधा से प्रेम की चोटे करते है ॥६॥ खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, नंद-महरि कैं आई (हो) । सकुच सहित मधुरे करि बोली, घर हीं कुँवर कन्हाई (हो) । सुनत स्याम कोकिल सम बानी, निकसे अति अतुराई (हो) । माता सौं कछु करत कलह हे, रिस डारी बिसराई (हो) । मैया री तू इनकौं चीन्हति, बारम्बार बताई (हो) । जमुना-तीर काल्हि मैं भूल्यौ, बाँह पकरि लै आई (हो) । आवति इहाँ तोहिं सकुचति है, मैं दै सौंह बुलाई (हो) । सूर स्याम ऐसे गुन-आगर, नागरि बहुत रिझाई (हो) ॥७॥ अर्थ-खेलने के बहाने कुमारी राधा नन्द महर के (घर) आई । संकोच के साथ मधुरता से बोलती है कि (हे) कुँवर कृष्ण घर हो ? कोयल के समान राधा की बोली सुन कर (कृष्ण) अत्यधिक आकुलता से निकले । माता से कुछ तकरार कर रहे थे, पर (उस) क्रोध को वे तुरन्त भूल गये । (कृष्ण कहते है) मैया तुम इसको पहचानती हो । (फिर) बार-बार बताते है कि यमुना के किनारे कल मैं भटक गया था, (यह) मेरी बांह पकड़ कर ले आयी । यहां आते हुए इसको तुमसे संकोच होता है । मैने इसे
राधाकृष्ण १४६ सौगंध देकर बुलाया है। सूरदास कहते हैं गुणो के भांडार कृष्ण ने नागरि राधा को बहुत रिझाया ॥७॥ नाम कहा तेरौ री प्यारी। बेटी कौन महर की है तू, को तेरी महतारी। धन्य कोख जिहिँ तोकौँ राख्यो, धनि घरि जिहिँ अवतारी। धन्य पिता माता तेरे, छवि निरखति हरि-महतारी। मैं बेटी वृषभानु महर की, मैया तुमकौँ जानतिँ। जमुना-तट बहु बार मिलन भयौ, तुम नाहिँन पहिचानतिँ । ऐसी कहि, वाकौँ मैं जानति, वह तो बड़ी छिनारि। महर बड़ौ लंगर सब दिन कौ, हँसति देति मुख गारि । राधा बोलि उठी, बाबा कछु, तुमसौ ढीठौ कीन्हौ। ऐसे समरथ कव मैं देखे, हँसि प्यारिहिँ उर लीन्हौ। महरि कुँवरि सौँ यह कहि भाषति, आउ करौँ तेरी चोटी। सूरदास हरषित नंदरानी, कहति महरि हम जोटी ॥८॥ अर्थ - प्यारी तेरा क्या नाम है। तू कौन महर की बेटी है और कौन तुम्हारी माता है। वह कोख धन्य है जिसने तुझको रखा और वह (माता) धन्य है जिसने तुम्हें जन्म दिया। तुम्हारे पिता, माता (दोनो) धन्य है। (इस प्रकार) कृष्ण की माता (उसकी) छवि देखती हैं। (राधा उत्तर देती है) मैं वृषभानु महर की पुत्री हूँ, माता तुमको जानती हूँ। यमुना के तट पर बहुत बार मिलन हुआ है, (क्या) तुम नही पहचानती हो। ऐसा कहो, उसको मैं जानती हूँ, वह तो बहुत कुलटा है। महर (वृषभानु भी) सब दिन के वडे धृष्ट हैं, इस प्रकार (यशोदा) हँसती और मुंह से गाली देती है। राधा (इस पर) वोल उठी कि वावा ने क्या तुमसे कुछ धृष्टता की है। इस पर यशोदा ने कहा ऐसे समर्थ उनको मैंने कब देखा ? फिर हँस कर प्यारी राधा को हृदय से लगा लिया। यशोदा कुँवरि राधा से यह कहती है - आओ तुम्हारी चोटी करूँ । सूरदास कहते हैं नन्दरानी प्रसन्न होती हैं और कहती है कि महरि और हम जोड़ी है ॥८॥ जसुमति राधा:कुँवरि सँवारति । बड़े वार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरुवारति । माँग पारि वेनी जु सँवारति, गूँथी सुन्दर भाँति । गोरैँ भाल बिंदु बदन, मनु इन्दु प्रात-रवि काँति । सारी चीरि नई फरिया लै, अपने हाथ बनाइ । अंचल सौँ मुख पोँछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ । तिल, चाँवरी, बतासे, मेवा, दियौ कुँवरि की गोद । सूर स्याम-राधा तनु चितवत, जसुमति मन-मन मोद ॥६॥
१५० सूरसागर सार सटीक अर्थ—यशोदा कुमारी राधा को सँवारती हैं। फिर की मांग के बढ़े बालो को प्रेम के साथ सुलझाती हैं। उन्होंने मांग काढ़कर, चोटी को सँवारकर, सुन्दर तरह से गूंथा। गोरे मस्तक (और गोरे) मुख पर विन्दी ऐसी शोभित है मानो चन्द्रमा तथा प्रातः कालीन सूर्य की कांति एक साथ शोभित हो रही हो। यशोदा ने साड़ी को चीर कर अपने हाथ से नया लहँगा बनाया, फिर अपने आंचल से राधा के मुख तथा अन्य सब अङ्गो को पोछ कर उन्होंने अपने हाथ से लहँगा पहना दिया। इसके उपरान्त तिल, चावल, बतासा और मेवा से कुँवरि (राधा) की गोद भरी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और राधा की ओर देखते हुए यशोदा मन-ही-मन आनन्दित हैं ॥६॥ बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी । किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिँ कच गूँदि माँग सिर पारी । खेलत रही नंद कैँ आँगन, जसुमति कही कुँवरि ह्वाँ आ री । मेरौ नाउँ बूझि बाबा कौ, तेरौ बूझि दई हँसि गारी । तिल, चाँवरी गोद करि दीनी, फरिया दई फारि नव सारी । मो तन चितै, चितै ढोटा-तन, कछु सविता सौँ गोद पसारी । या सुनि कै वृषभानु मुदित चित, हँसि-हँसि बूझत बात दुलारी । सूर सुनत रस-सिन्धु बढ्यौ अति, दम्पति एकै बात विचारी ॥१०॥ अर्थ—माता पूछती हैं कि प्यारी तुम कहाँ थी। किसने तुम्हारे मस्तक पर तिलक की रचना की है, किसने बालों को गूंथ (सुलझा) कर सिर की मांग निकाली है। (राधा उत्तर देती है) जब मैं नंद के आंगन मे खेल रही थी, तब यशोदा ने कहा कुँवरि यहाँ आओ। मेरा नाम पूछा और बाबा का नाम पूछा, फिर तुम्हारा नाम पूछ कर हँसते हुए गाली दी। तिल और चावल से (मेरी) गोद भर दी तथा नयी साड़ी फाड़कर लहँगा पहनाया। मेरी ओर देखकर और पुत्र की ओर देखकर उन्होने सूर्य की ओर आंचल पसार कर कुछ प्रार्थना की। यह सुनकर वृषभानु प्रसन्न मन से हँस-हँसकर प्यारी राधा से बात पूछते है। सूरदास कहते है कि (यह सब) सुनते ही दंपति के हृदय मे रस. का सागर अत्यधिक उमड़ आया और दोनो के मन मे एक ही विचार उठा ॥१०॥ गारुड़ी कृष्ण सखियनि मिलि राधा घर लाईं । देखहु महरि सुता अपनी कौँ, कहुँ इहिँ कारैँ खाई । हम आगैँ आवति, यह पाछैँ, धरनि परी भहराई । सिर तैँ गई दोहनी ढरिकै, आपु रही मुरझाई । स्याम-भुअंग डस्यौ हम देखत, ल्यावहु गुनी बुलाई । रोवति जननि कंठ लपटानी, सूर स्याम गुन राई ॥११॥
राधाकृष्ण १५१ अर्थ—सखियाँ मिलकर राधा को घर ले आयी और कहने लगी, महरि अपनी बेटी को देखो, कही इसे सांप ने काट लिया है। हम सब आगे-आगे आ रही थीं, पीछे यह जमीन पर गिर पड़ी। सिर से दोहनी (दूध की हांड़ी) ढुलक गयी, स्वयं मुरझा गयी। हमारे देखते इसे काले सांप ने डस लिया, किसी गुणी को बुला लाओ। रोती हुई माता कंठ से लिपटकर कहती है कि कृष्ण ही गुणियो मे श्रेष्ठ हैं ॥१११॥ नंद-सुवन गारुड़ी बुलावहु। कह्यौ हमारौ सुनत न कोऊ, तुरत जाहु, लै आवहु। ऐसौ गुनी नहीं त्रिभुवन कहूँ, हम जानतिँ हैं नीकै। आइ जाइ तौ तुरत जियावहिँ, नैँकु छुवत उठै जी कै। देखौ धौँ यह बात हमारी, एकहि मन्त्र जिवावै। नन्द महर कौ सुत सूरज जौ, कैसेहुँ ह्याँ लौ आवै ॥१२॥ अर्थ-गारुड़ी नंद के पुत्र (कृष्ण) को बुलाओ। हमारा कहना तो कोई सुनता नही, तुरन्त जाकर ले आओ। ऐसा सांप के मंत्र को जानने वाला तीनो लोक मे कोई नही है। हम उसे अच्छी तरह जानती हैं। आ जायँ तो तुरन्त जिला दे, तनिक छूते ही जी कर उठ जाय। हमारी यह बात निश्चय करके देखो एक ही मंत्र मे वह जिला देता है। नन्द महर के पुत्र को कैसे भी यहाँ पर ले आया जाय ॥१२॥ महरि, गारुड़ी कुँवर कन्हाई। एक बिटिनियाँ कारैँ खाई, ताकौँ स्याम तुरतहीँ ज्याई। बोलि लेहु अपने ढोटा कौँ, तुम कहि कै देउ नैँकु पठाई। कुँवरि राधिका प्रात खरिक गई, तहाँ कहूँ-धौँ कारैँ खाई। यह सुनि महरि मनहिँ मुसुक्यानी, अबहिँ रही मेरैँ गृह आई। सूर स्याम राधहिँ कछु कारन, जसुमति समुझि रही अरगाई ॥१३॥ अर्थ-हे महरि (यशोदा) कुँवर कृष्ण सांप के विष को मंत्र से उतारने वाले है। एक लड़की को सांप ने काट लिया, उसे कृष्ण ने तुरन्त जिला दिया। अपने पुत्र को बुला लो और तुम (स्वयं) कहकर उसे भेज दो। कुमारी राधा प्रातः पशुओं के चरने के स्थान पर गई थी वहाँ कही उसे काले सांप ने काट लिया। यह सुनकर महरि (यशोदा) ने मन ही मन मुस्करा कर सोचा, अभी तो हमारे ही घर थी। सूरदास कहते हैं कि यशोदा राधा की मूर्च्छा के मूल कारण को समझकर चुप हो गईं ॥१३॥ तब हरि कौँ टेरति नंदरानी। भली भई सुत भयौ गारुड़ी, आजु सुनी यह बानी। जननी-टेर सुनत हरि आए, कहा कहति री मैया ?। कीरति महरि बुलावन आई, जाहु न कुँवर कन्हैया। कहूँ राधिका कारैँ खाई, जाहु न आवौ झारि। जंत्र-मंत्र कछु जानत हौ तुम, सूर स्याम बनवारि ॥१४॥
१५२ सूरसागर सार सटीक अर्थ—तब कृष्ण को नंदरानी जोर से बुलाती हैं। अच्छा हुआ पुत्र गारुड़ी हो गया, (मैंने) यह बात आज सुनी। माता की पुकार को सुनकर कृष्ण आये, (और पूछने लगे) माता क्या कहती हो। कीरति नाम की महरि बुलाने आयी है, कुँवर कृष्ण जाते क्यों नही। राधा को कही सांप ने डस लिया है, जाओ झाड़ (फूँक) आओ न ! सूरदास कहते हैं कि (यशोदा कहती हैं) बनवारी कृष्ण तुम कुछ जन्त्र-मन्त्र जानते हो ॥१५४॥ हरि गारुड़ी तहाँ तब आए। यह बानी वृषभानु सुता सुनि, मन-मन हरष बढ़ाए। धन्य-धन्य आपुन कौं कीन्हौ, अतिहिं गई मुरझाई। तन पुलकित रोमांच प्रगट भए, आनंद-अश्रु बहाइ। विह्वल देखि जननि भई व्याकुल, अँग विष गयौ समाइ। सूर स्याम-प्यारी दोउ जानत, अन्तरगत कौ भाइ ॥१५५॥ अर्थ—तब गारुड़ी कृष्ण वहाँ आये। यह वाणी सुनकर राधा के मन-ही-मन मे हर्षोल्लास हुआ। अत्यन्त मुरझाई हुई राधा ने अपने को धन्य-धन्य माना। उसके पुलकित शरीर मे रोमांच प्रकट हो गया और आनद के आंसू बहने लगे। (राधा को) विह्वल देखकर माता व्याकुल हो गयी कि (राधा के) अंग मे विष समा गया। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और (प्यारी) राधा दोनों पारस्परिक अन्तर के भाव को समझते हैं ॥१५५॥ रोवति महरि फिरति विततानी। बार-बार लै कंठ लगावति, अतिहिं सिथिल भई पानी। नन्द सुवन कैं पाइ परी लै, दौरि महरि तब आइ। व्याकुल भई लाड़िली मेरी, मोहन देहु जिवाइ। कछु पढ़ि-पढ़ि कर, अंग परस करि, विष अपनी लियौ झारि। सूरदास-प्रभु बड़े गारुड़ी, सिर पर गाडू डारि ॥१५६॥ अर्थ—रोती हुई महरि व्याकुल फिरती हैं। बार-बार (राधा को) लेकर गले से लगाती हैं। वह अत्यधिक शिथिल होकर पानी-पानी (द्रवित) हो गईं। तब महरि दौड़कर कृष्ण के पैरो पर (गिर) पढी। (ओर बोली) मेरी प्रिय पुत्री व्याकुल हो गयी है, मोहन उसे जिला दो। कुछ पढ-पढ़ कर, अंग छू कर, सिर पर जादू डालकर कृष्ण ने विष झाड दिया। सूरदास कहते हैं कि (इस प्रकार) कृष्ण बड़े गारुड़ी (सिद्ध हो गये) है ॥१५६॥ लोचन दए कुँवरि उघारि। कुँवर देख्यौ नन्द कौ तब, सकुची अंग सम्हारि। बात बूझति जननि सौं री, कहा है यह आज। मरत तैं तू बची प्यारी, करति है कह लाज। तब कहति तोहिं कारैं खाई, कछु न रहि सुधि गात। सूर प्रभु तोहिं ज्याइ लीन्ही, कही कुंवरि सौं मात ॥१५७॥
राधाकृष्ण १५३ अर्थ - कुँवरि राधा ने आंखें खोल दी, जब कृष्ण को देखा तो संकोच से अङ्गों को सम्हाला । (फिर) राधा माता से (एक) बात पूछती है कि यह आज क्या है ? (माता ने कहा) प्यारी आज तू मरने से बची, लाज क्यो करती हो। तब कहती है सांप ने काट लिया था इसलिए शरीर मे चेतना नही थी । सूरदास कहते है कि माता राधा से कहती हैं कि कृष्ण ने तुझे जिला लिया ॥१७॥ बड़ौ मंत्र कियौ कुँवर कन्हाई । बार-बार लै कंठ लगायौ, मुख चूम्यौ दियौ घरहिं पठाई । धन्य कोष वह महरि जसोमति, जहाँ अवतर्यौ यह सुत आई । ऐसी चरित तुरतहीँ कीन्हौँ, कुँवरि हमारी मरी जिवाई । मनहीँ मन अनुमान कियौ यह, बिधिना जोरी भली बनाई । सूरदास प्रभु बड़े गारुड़ी, ब्रज घर-घर यह घैरु चलाई ॥१८॥ अर्थ—कुँवर कृष्ण ने बड़े मंत्र का प्रयोग किया । (राधा की मां ने) कृष्ण को लेकर बार-बार गले से लगाया और मुख चूमकर घर भेज दिया । वह महरि यशोदा की कोख (कुक्षि) धन्य है, जिससे इस पुत्र ने जन्म (अवतार) लिया । तुरन्त ऐसा उपाय किया जिससे मेरी मरी हुई बेटी जी गई । फिर उन्होने मन-ही-मन अनुमान किया कि ब्रह्मा ने भली जोड़ी बनायी है । सूरदास कहते है कि कृष्ण बड़े गारुड़ी हैं, ब्रज के घर-घर में यह चर्चा चल पडी ॥१८॥ सम्बन्ध रहस्य तुम सौँ कहा कहौँ सुन्दर घन । या ब्रज मैं उपहास चलत है, सुनि सुनि स्रवन रहति मनहीँ मन । जा दिन सबनि पछारि, नोइ करि, मोहिं दुहि दई धेनु बंसीबन । तुम गही बाँह सुभाइ आपनैँ, हौँ चितई हँसि नैंकु बदन-तन । ता दिन तैँ घर मारग जित तित, करत चवाव सकल गोपीजन । सूर-स्याम अब साँच पारिहौँ, यह पतिब्रत तुम सौँ नँद-नंदन ॥१९॥ अर्थ— सुन्दर कृष्ण तुमसे क्या कहूँ । इस ब्रज मे हंसी होती है । कान से सुन- सुन कर मन-ही-मन (चुप) रह जाती हूँ। जिस दिन सब को पछाड़कर तुमने नयी गाय को नोइ (दुहने के समय रस्सी से गाय के पिछले पैर को बांध) कर वंशीवन मे दुहा और आपने स्वभाव वश (मेरी) बांह पकडी, (और) मैं तनिक (तुम्हारे) मुख की ओर देखकर किंचित हँस दी । उसी दिन से घर, मार्ग और जहाँ तहीं गोप जन कुचर्चा करते है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कि अब कृष्ण तुम्हारे प्रति सच्चे पति व्रत का पालन करूंगी ॥१९॥
१५४ सूरसागर सार सटीक स्याम यह तुमसौँ क्यौँ न कहौँ। जहाँ तहाँ घर घर कौ घेरा, कौनी भाँति सहौँ। पिता कोपि करवाल गहत कर, बंधु वधन कौँ धावै। मातु कहै कन्या कुल कौ दुख, जनि कोऊ जग जावै। बिनती एक करौँ कर जोरे, इनि वीधिन जनि आवहु। जौ आवहु तौ मुरलि-मधुर-धुनि, मो जनि कान सुनावहु। मन क्रम वचन कहति हौँ सांची, मैँ मन तुमहिँ लगायौ। सूरदास-प्रभु अन्तरजामी, क्यौँ न करौ मन भायौ ॥२०॥ अर्थ—कृष्ण यह तुमसे क्यो न कहूँ । जहां-तहां घर-घर की कुचर्चा किस तरह सहूँ । पिता क्रोधित होकर हाथ मे तलवार लेते हैं । भाई मारने को दोडते हैं । माता कहती है कि कन्या कुल का दुःख है, जग मे कोई (कन्या) न पैदा करे । (राधा कहती है) तुमसे मैं हाथ जोडकर विनती करती हूँ कि इन गलियो में मत आओ । जो आओ (भी) तो मुरली की मधुर ध्वनि मेरे कान मे न पडने पाये । मन, कर्म और वचन से सत्य कहती हूँ, मैंने मन तुम्ही मे लगाया है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण तुम अन्तर की बात जानने वाले हो, क्यो मन को भाने वाली बात नही करते हो ॥२०॥ हँसि बोले गिरिधर रस-बानी। गुरजन खिझैँ कतहिँ रिस पावति,काहे कौँ पछतानी। देह धरे कौ धर्म यहै है, स्वजन कुटुंब गृह-प्रानी। कहन देहु, कहि कहा करैँगे, अपनी सुरत हिरानी ?। लोक लाज काहै कौँ छोड़ति, ब्रजहीँ बसैँ भुलानी। सूरदास घट द्वै हैं, मन इक, भेद नहीं कछु जानी ॥२१॥ अर्थ—हँसकर कृष्ण रस से भरी वाणी बोले। गुरुजन के खीझने पर तुम नाराज क्यो होती हो और पछताती क्यो हो । शरीर धारण करने वाले का यही धर्म है। स्वजन, कुटुंब तथा घर के प्राणी (जो कुछ कहते हो) कहने दो, कहकर क्या करेगे ? क्या (तुम्हारी) स्वयं की स्मृति (सुरति) खो गयी है ? लोक की लाज क्यो छोड़ती हो । ब्रज में बसने पर भूल गई। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण कहते है) शरीर दो है किन्तु मन एक ही है, इसमे (मैं) कुछ भेद नही जानता ॥२१॥ ब्रज बसि काके बोल सहौँ । तुम बिनु स्याम और नहिँ जानौँ, सकुचि न तुमहिँ कहौँ। कुल की कानि कहा लै करिहौँ, तुमकौँ कहाँ लहौँ । धिक माता, धिक पिता बिमुख तुव, भावै तहाँ बहौँ । कोउ कछु करै, कहै कछु कोऊ, हरष न सोक गहौँ । सूर स्याम तुमकौँ बिनु देखैँ, तनु मन जीव दहौँ ॥२२॥
अर्थ—(राधा कहती है) ब्रज मे बसकर किसके बोल (व्यंग्य) सहूँ। कृष्ण तुम्हारे सिवाय मैं किसी और को नही जानती। संकोच के कारण तुमसे नही कहती हूँ। कुल की मर्यादा का निर्वाह कहाँ तक करूँगी, (उस स्थिति में) तुमको कैसे पाऊँगी। माता पिता सबको धिक्कार है। तुम से विमुख होकर जो जहाँ चाहे वहाँ बहे अर्थात् जो जैसा चाहे कहे। कोई कुछ भी करे, कुछ भी कहे, मैं हर्ष या विषाद कुछ नही मानती। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) कृष्ण तुम्हे बिना देखे, मैं शरीर, मन, जीव सब जला दूँगी ॥२२॥ ब्रजहिँ बसैँ आपुहिँ बिसरायौ । प्रकृति पुरुष एकहि करि जानहु, बातनि भेद करायौ । जल थल जहाँ रहौँ तुम बिनु नहिँ, वेद उपनिषद गायौ । द्वै-तन जीव-एक हम दोऊ, सुख-कारन उपजायौ । ब्रह्म-रूप द्वितिया नहिँ कोऊ, तब मन तिया जनायौ । सूर स्याम-मुख देखि अलप हँसि, आनंद-पुंज बढ़ायौ ॥२३॥ अर्थ - (कृष्ण कहते हैं) ब्रज में अपने (मूल रूप) को भुलाकर हम निवास करते हैं। प्रकृति और पुरुष को एक ही करके जानो, (दोनो मे) केवल कहने मे भेद किया गया है। जल, पृथ्वी कही भी, तुम्हारे बिना नही रहता हूँ, वेद तथा उपनिषद् (भी यही) कहते हैं। हम दोनो दो तन तथा एक जीव रूप मे सुख के लिए उत्पन्न हुए है। ब्रह्म का कोई दूसरा रूप नही है। इस प्रकार मन (की बात) प्रिया को (कृष्ण ने) जना दिया। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के मुख को देख कर राधा किंचित हँस दी और इस प्रकार उनका आनन्दोल्लास बढ़ गया ॥२३॥ तव नागरि मन हरष भई । नेह पुरातन जानि स्याम कौ, अति आनंद-भई । प्रकृति पुरुष, नारी मैं वै पति, काहैँ भूलि गई । को माता, को पिता, बंधु को, यह तो भेंट नई । जन्म-जन्म, जुग-जुग यह लीला, प्यारी जानि लई । सूरदास प्रभु की यह महिमा, यातैँ बिबस भई ॥२४॥ अर्थ—तब नागरि राधा का मन हर्षित हुआ। कृष्ण के पुरातन स्नेह को जानकर उन्हें अत्यधिक आनन्द हुआ। प्रकृति-पुरुष के रूप मे मैं नारी और वे पति हैं, (यह मैं) क्यों भूल गयी। कौन माता, कौन पिता, कौन भाई, यह तो नयी भेट (सम्बन्ध) है। जन्म-जन्म और युग-युग की इस लीला को प्यारी (राधा) ने जान लिया। सूरदास कहते हैं कि प्रभु की यह महिमा है जिससे (राधा) विवश हो गयी ॥२४॥ देह धरे कौ कारन सोई । लोक-लाज कुल-कानि तजियै, जातैँ भलौ कहै सब कोई ।
१५६ सूरसागर सार सटीक मातु पिता के डर कौँ मानै, मानै सजन कुटुंब सब लोई । तात मातु मोहूँ कौँ भावत, तन धरि कै माया-बस होई । सुनि वृषभानु-सुता मेरी बानी, प्रीति पुरातन राखहु गोई । सूर स्याम नागरिहिँ सुनावत, मैं तुम एक नाहिं हैं दोई ॥२५॥ अर्थ—शरीर धारण करने का वही कारण है। लोक की लाज तथा कुल की मर्यादा न छोड़िये, जिससे सब लोग भला कहे। माता पिता के डर को माने तथा अपने सम्बन्धियो तथा कुटुम्बियो (के डर) को माने। पिता-माता मुझे (राधा को) भाते हैं। (क्योकि) शरीर धरकर (मै) माया बस हो गयी। (कृष्ण कहते हैं) हे वृषभानु की पुत्री मेरी बात सुनो, पुरानी प्रीति छिपाकर रखो। सूरदास कहते है कि नागरि राधा को (कृष्ण) सुनाते हैं कि हम तुम एक है, दो नही ॥२५॥ राधा-सखी संवाद घरहिं जाति मन हरष बढ़ायौ । दुख डारयौ, सुख अंग भार भरि, चली लूट सौ पायौ । भौँह सकोरति चलति मंद गति, नैंकु बदन मुसुकायौ । तहँ इक सखी मिली राधा कौँ, कहति भयौ मन भायौ । कुंज-सुवन हरि-संग विलस रस, मन कौ सुफल करायौ । सूर सुगन्ध चुरावनहारी, कैसैं दुरत दुरायौ ॥२६॥ अर्थ—घर जाते समय राधा का मन हर्षोल्लसित हो गया है। दुःख को छोड़ कर सुख के भार से अंगों को भरकर चली जैसे लूट का माल पा गयी हो। भौंह को सिकोड़ती, धीमी चाल से चलती हुई तनिक मुख पर मुसकान आ गयी। वहाँ एक सखी राधा को मिली और कहती है कि तुम्हारे मन को भाने वाला हुआ। कुंज के भवन मे कृष्ण के साथ विलसने का रस पाकर मन को सफल कर लिया। सूरदास कहते है कि (सखी कहती है) सुगंध को चुराने वाला छिपाने से कैसे छिप सकता है ॥२६॥ मोसीँ कहा दुरावति राधा । कहाँ मिली नंद-नंदन कौँ, जिनि पुरई मन की साधा । ब्याकुल भई फिरति हो अवहीँ, बाग-बिथा तनु बाधा । पुलकित रोम रोम गद गद, अब अंग अंग रूप अगाधा । नहिं पावत जो रस जोगी जन, जप तप करत समाधा । सुनहु सूर तिहिँ रस परिपूरन, दूरि कियौ तनु दाधा ॥२७॥ अर्थ—राधा मुझसे क्यो छिपाती हो। (तुम) कृष्ण को कहाँ मिली, जिन्होने मन की साध (इच्छा) पूरी कर दी। अभी व्याकुल होकर घूमती थी और शरीर काम की पीड़ा से दुखी था। (अब) रोम-रोम पुलकित तथा गद्गद है। अंग-अंग मे गहरा रूप निखर आया है। जो रस योगी जप, तप तथा समाधि करके भी नही पाते।
राधाकृष्ण १५७ सूरदास कहते हैं, सुनो, उसी रस से परिपूर्ण करके कृष्ण ने शरीर के दाह को दूर कर दिया ॥२७॥ स्याम कौन कारे की गोरे। कहाँ रहत काके पै ढोटा, वृद्ध, तरुन की धौं हैं भोरे। इहँई रहत कि और गाउँ कहुँ, मैं देखे नाहिंन कहूँ उनकौं। कहै नहीं समुझाइ बात यह, मोहिं लगावति हौ तुम जिनकौं। कहाँ रहीं मैं, वै धौं कहँकै, तुम मिलवति हौ काहैं ऐसी। सुनहु सूर मोसी भोरी कौं, जोरि जोरि लावति हौ कैसी ॥२८॥ अर्थ- (राधा कहती है) श्याम (कृष्ण) कौन है। (वह) काले हैं कि गोरे। कहाँ रहते हैं और किसके पुत्र है। वृद्ध हैं कि युवक हैं कि भोले हैं। यही रहते हैं कि और किसी गांव मे (रहते हैं)। मैंने कही उनको देखा नही है। यह बात समझाकर कहो जिससे मेरा अवैध (भोग-विलास का) सम्वन्ध लगाती हो। मैं कहां रहती हूँ, वे पता नही कहाँ के हैं। तुम क्यों ऐसे (व्यर्थ ही) बातें मिलाती हो। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) मेरी जैसी भोली को क्या उलटा-पुलटा लगा रही हो ॥२८॥ सुनहु सखी राधा की बातें। मोसौँ कहति स्याम हैं कैसे, ऐसी मिलई घातैं। की गोरे, की कारे-रँग हरि, की जोबन, की भोरे। की इहिं गाउँ बसत, की अनतहिं, दिननि बहुत की थोरे। की तू कहति बात हंसि मोसौँ, की बूझति सति-भाउ। सपनैँ हूँ उनकौं नहिं देखे, वाके सुनहु उपाउ। मोसौँ कही कौन तोसी प्रिय, तोसौँ बात दुरैहौं। सूर कही राधा मो आगैँ, कैसैँ मुख दरसैहौँ ॥२६॥ अर्थ-सखी राधा की बातें सुनो। मुझसे कहती है कि कृष्ण कैसे हैं। इस प्रकार कपटपूर्ण बाते बनाती है कि (कृष्ण) गोरे है कि काले है, युवक हैं या किशोर (भोले) है। (वह) इस गाँव में बसते हैं कि दूसरी जगह, बड़े (बहुत दिन के) हैं कि छोटे (थोड़े दिन के) हैं। तू मुझसे हँसी की बात कहती हो कि सच्चे भाव से पूछती हो? स्वप्न में भी मैंने उनको नही देखा। उसके (राधा के बहाने बनाने के) उपाय को सुनो। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे समान प्रिय कौन है जिससे कि मैं बात छिपाऊँगी। सूरदास कहते हैं कि (एक सखी दूसरी सखी से कहती है) राधा मेरे आगे कैसे मुंह दिखायेगी ॥२६॥ राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ। जब तू इत-उत बंक बिलोकति, होत निसा-पति फीकौ। भृकुटी धनुष, नैन सर सांधे, सिर केसरि कौ टीकौ। मनु-घूंघट-पट मैं दुरि बैठ्यो, पारधि रति-पतिही कौ।
१५८ सूरसागर सार सटीक गति मैमंत नाग ज्यौं नागरि, करे कहति हों लीकी। सूरदास-प्रभु विविध भाँति करि, मन रिझयौ हरि पी कौ ॥३०॥ अर्थ-राधा तुम्हारा मुख अच्छी तरह से शोभित है। जब तुम इधर-उधर तिरछे देखती हो तो चन्द्रमा फीका हो जाता है। भौंह रूपी धनुष, नैन रूपी बाणों को साधे हुए है। मस्तक (सिर) पर केशर का टीका ऐसा जान पड रहा है मानो घूंघट के बीच कामदेव का शिकारी छिपकर बैठा हो। हे नागरि (तुम्हारी) चाल मतवाले हाथी के समान है, (यह सब) लकीर खींचकर कहती हूँ। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) विविध भाँति (के श्रृङ्गार से) प्रिय कृष्ण के मन को (तुमने) रिझाया ॥३०॥ काकौ काकौ मुख माई बातनि कौं गहिये। पाँच की सात लगायी, झूठी-झूठी के बनायी, साँची जौ तनक होई, तौलौं सब सहियै। बातनि गह्यौ अकास, सुनत न आवै साँस, बोलि तौ कछू न आवै, तातैं मौन गहियै। ऐसैं कहैं नर नारि, बिना भीति चित्रकारि, काहे कौं देखे मैं कान्ह, कहा कही कहियै। घर घर यहै घैर, वृथा मोसौँ करैं वैर, यह सुनि स्त्रौन, हिरदय दहिए। सूरदास बरु उपहास होइ सिर मेरैं, नद कौ सुवन मिलै, तो पै कहा चहियै ॥३१॥ अर्थ-सखी किसके-किसके मुख की बातो को पकड़ा जाय। लोग पाँच का सात लगाते हैं, झूठी-झूठी बाते बनाते हैं। इसमे यदि कुछ भी सच हो तो उसे सहा भी जाय। बातो ही बातो मे आकाश छूते है, और ऐसी बातें सुनकर ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह जाती है। कुछ उत्तर में कहते नही बनता, अतः मौन धारण करना ही अच्छा है। इन लोगो (नर-नारियो) की बात ऐसी है, जैसे भीति के बिना चित्रावली की कल्पना करना। मैंने भला कान्ह को क्यों देखा होगा। क्या बताऊँ और क्या कहूँ, (इस गांव मे) घर-घर तो यही चर्चा चल रही है, जैसे कि सब मुझसे वैर रखते हों। कानो से सुन-सुन कर मेरा हृदय जलता है। सूरदास कहते हैं कि (अब तो राधा सब घोषित करती है) भले ही अब लोग मेरा उपहास उड़ाएँ, पर नन्द नन्दन कृष्ण मिल जाने पर फिर किसी को क्या चाहिये ॥३१॥ कैसे हैं नँद-सुवन कन्हाई। देखे नहीं नैन भरि कबहूँ, ब्रज मैं रहत सदाई। सकुचति हौँ इक बात कहति तोहिं, सो नहिं जाति सुनाई। कैसैं हुं मोहिं दिखावहु उनकौं, यह मेरैं मन आई।
राधाकृष्ण १५६ अतिहीँ सुंदर कहियत हैंँ वै, मोकौँ देहु वताई । सूरदास राधा की बानी, सुनत सखी भरमाई ॥३२॥ अर्थ-नंद के पुत्र कृष्ण कैसे है ? (उन्हें) आंख भरके कभी देखा नहीं, (यद्यपि) वह ब्रज में सदा रहते है । तुमसे एक बात कहने में सकुचाती हूँ , उसे सुनाया नही जाता । कैसे भी उनको हमे दिखाओ, यह (भावना) मेरे मन मे आ गयी है । वह अत्यधिक सुन्दर कहे जाते हैं, (उन्हे) मुझे बता दो । सूरदास कहते हैं कि राधा की वाणी सुनकर सखी भ्रम मे पड़ गयी ॥३२॥ सुनहु सखी राधा की बानी । ब्रज बसि हरि देखे नहिँ कबहूँ, लोग कहत कछु अकथ कहानी । यह अब कहत दिखावहु हरि कौँ, देखहु री यह अचिरज मानी । जो हम सुनति रही सो नाहीँ, ऐसेँ ही यह वायु बहानी । ज्वाव न देत बनै काहू सौँ, मन मैँ यह काहू नहिँ मानी । सूर सबै तरुनी मुख चाहतिँ, चतुर-चतुर सौँ चतुरई ठानी ॥३३॥ अर्थ-सखी, राधा की बात तो सुनो । ब्रज मे बसकर इसने कृष्ण को कभी नही देखा, और लोग तो बेसिर-पैर की बात करते हैं अथवा कुछ न कही जा सकने वाली कहानी कहते हैं । यह अब कहती है कि कृष्ण को दिखाओ, यह श्रेष्ठ आश्चर्य देखो । जो हम सुनती रही वह (ठीक) नही है, यह ऐसे ही हवा मे बह गयी इसकी (चर्चा चल पड़ी) । किसी से जवाब नही देते बनता, मन मे कोई इसे मानेगा भी नही । सूरदास कहते हैं कि सभी युवतियां (कृष्ण के) मुख (का दर्शन) चाहती है, फिर (इसके लिए) चतुर-से-चतुर स्त्रियों ने चतुरता ठान ली ॥३३॥ सुनि राधे तोहिँ स्याम दिखैहैँ । जहाँ तहाँ ब्रज-गलिनि फिरत हैंँ, जब इहिँ मारग ऐहैँ । जबहीँ हम उनकौँ देखैँगी, तबहीँ तोहिँ बुलैहैँ । उनहूँ कैँ लालसा बहुत यह, तोहिँ देखि सुख पैहैँ । दरसन तैँ धीरज जब रैहै, तब हम तोहिँ पत्यैहैँ । तुमकौँ देखि स्याम सुन्दर घन, मुरली मधुर बजैहैँ । तनु त्रिभंग करि अंग अंग सौँ, नाना भाव जनैहैँ । सूरदास-प्रभु नवल कान्ह बर, पीतांबर फहरैहैँ ॥३४॥ अर्थ-सुनो राधा तुम्हे कृष्ण को दिखाऊँगी । वे जहाँ-तहाँ ब्रज की गलियो मे घूमते रहते हैं । जब इस मार्ग से आयेंगे और जब उनको हम देखेगे तभी तुम्हे बुलायेगे । उनकी भी बहुत अभिलाषा है, तुम्हे देखकर सुख पायेगे । दर्शन से जब तुम्हे धीरज रहेगा तभी हम लोग तुम्हारा विश्वास करेंगे । तुमको देखकर श्यामसुन्दर कृष्ण मधुर मुरली बजायेगे । शरीर को त्रिभंगी (तीन तरह) आकृति मे मोड़कर अग-अंग से
१६० सूरसागर सार सटीक अनेक भाव दिखायेगे । सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) नवल तथा श्रेष्ठ कृष्ण पीताम्बर फहरायेगे ॥३४॥ माता की सीख काहे कौं पर-घर छिनु-छिनु जाति । घर मैं डांटि देति सिख जननी, नाहिंन नैंकु डराति । राधा-कान्ह कान्ह राधा व्रज, ह्वै रह्यौ अतिहि लजाति । अब गोकुल की जैबौ छाँड़ौ, अपजस हू न अघाति । तू वृषभानु बड़े की बेटी, उनकैं जाति न पांति । सूर सुता समझावति जननी, सकुचति नहिँ मुसुकाति ॥३५॥ अर्थ—दूसरे के घर क्षण-क्षण क्यो जाती हो । घर मे माता फटकार कर सीख देती है कि तुम तनिक भी नही डरती हो । राधा-कृष्ण और कृष्ण-राधा यही चर्चा व्रज मे व्याप्त हो गयी है, इससे (मुझे) अत्यधिक लाज लगती है । अब गोकुल का जाना छोड़ दो, अपयश से (तुम) नही अघाती हो । तुम श्रेष्ठ वृषभानु की बेटी हो, उन (कृष्ण) की जाति-पांति का कुछ ठीक नही है । सूरदास कहते हैं कि माता पुत्री को समझाती हैं । इससे राधा सकुचाती नही (बल्कि) मुसकाती है ॥३५॥ खेलन कौं मैं जाउं नहीं ? और लरिकिनी घर घर खेलति, मोहीँ कौं पै कहति तुहीँ । उनकैं मातु पिता नहिं कोई, खेलत डोलतिँ जहाँ तहीँ । तोसी महतारी वहि जाइ न, मैं रहौँ तुमहीँ बिनुहीँ । कबहूँ मोकौं कछू लगावति, कबहूँ कहति जनि जाहु कही । सूरदास बातैँ अनखौहीँ, नाहिंन मो पै जाति सही ॥३६॥ अर्थ—(राधा कहती है) मैं खेलने न जाऊँ ?-और लड़कियां घर-घर खेलती हैं; किन्तु तुम मुझे ही कहती हो । (क्या) उनके माता-पिता नही है, जहां-तहां खेलती डोलती हैं । तुम्हारी जैसी मां मर जाय, मैं तुम्हारे बिना ही रहूँगी । कभी मुझे कुछ लगाती हो, कभी कहती हो कही खेलने मत जाओ । सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) यह क्रोध दिलाने वाली बात मुझसे सही नही जाती ॥३६॥ मनहौँ मन रीझति महतारी । कहा भई जौ बाढ़ि तनक गई, अबहौँ तौ मेरी है वारी । झूठैँ हीँ यह बात उड़ी है, राधा-कान्ह कहत नर नारी । रिस की बात सुता के मुख की, सुनत हँसति मनहीँ मन भारी । अब लौँ नहीँ कछू इहिँ जान्यौ, खेलत देखि लगावैँ गारी । सूरदास जननी उर लावति, मुख चूमति पोँछति रिस टारी ॥३७॥ अर्थ—मन-ही-मन माता रीझती है । क्या हुआ जो तनिक बढ़ गयी, अभी तो मेरी लड़की का बचपन ही है । यह बात झूठ ही उड़ गयी है और नर और नारी राधा
राधाकृष्ण १६१ और कृष्ण का नाम व्यर्थ ही लगाते है। वे पुत्री के मुख की क्रोध की बाते सुनकर मन- ही-मन बहुत हंसती है। अब तक इसके विषय मे लोगो ने कुछ नही जाना, केवल खेलते देखकर आरोप लगाते है। सूरदास कहते हैं कि माता (राधा को) हृदय से लगाती है और क्रोध दूर कर पोछती तथा मुख चूमती है ॥३७॥ सुता लए जननी समुझावति। संग बिटिनियनि कैँ मिलि खेलौ, स्याम-साथ सुनि-सुनि रिस पावति। जातैँ निंदा होइ आपनी, जातैँ कुल कौँ गारी आवति। सुनि लाड़ली कहति यह तोसैं, तोकौँ यातैँ रिस करि धावति। अब समुझी मैं बात सबनि की, झूठैं ही यह बात उड़ावति। सूरदास सुनि सुनि ये बातैँ, राधा मन अति हरष बढ़ावति ॥३८॥ अर्थ—बेटी को लेकर माता समझाती है कि लडकियो के साथ मिलकर खेलो । कृष्ण के साथ (खेलने की बात) सुनकर क्रोध आता है। जिससे अपनी निंदा हो और कुल को गाली आती हो (उसे नही करना चाहिए)। सुनो प्यारी बेटी यह तुमसे कहती हूँ, तेरी ओर इसी से क्रोध करके दौड़ती हूँ। अब मैं सबकी बात समझ गयी । (सब) लोग झूठ ही (कृष्ण और तुम्हारे बारे में) बात उडाते है । सूरदास कहते हैं कि ये बाते सुन-सुनकर राधा अपने मन में हर्षित होती है ॥३८॥ राधा विनय करत मनहौँ मन, सुनहु स्याम अंतर के जामी। मातु-पिता कुल-कानिहिं मानत, तुमहिँ न जानत हैं जग स्वामी। तुम्हारौ नाउ लेत सकुचत हैं, ऐसैं ठौर रही हौं आनी। गुरु परिजन की कानि मानियौ, बारंबार कही मुख बानी। कैसे संग रहौं विमुखनि कैँ, यह कहि-कहि नागरि पछितानी। सूरदास-प्रभु कैँ हिरदै धरि, गृह-जन देखि-देखि मुसुकानी ॥३६॥ अर्थ—राधा मन-ही-मन निवेदन करती है कि हे अंतर की बात जानने वाले कृष्ण सुनो !—माता और पिता तो कुल की मर्यादा को मानते है, (इसी से) संसार के स्वामी तुमको (जानकर भी) नही जानते (अर्थात् भुला देते हैं)। मैं ऐसे स्थान पर रह रही हूँ जहाँ तुम्हारा नाम लेते सकुचाती हूँ। (तुमने) बार-बार अपने मुख से यह बात कही कि गुरुजन की मर्यादा मानो। (लेकिन) भगवान् से विमुख (लोगो) के साथ कैसे रहूँ; यह कहकर नागरि राधा पछताती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को हृदय मे घर- कर घर के लोगो को देख-देखकर (राधा) मुसकायी ॥३६॥ कृष्ण-दर्शन राधा जल बिहरति सखियन संग। ग्रीव-प्रजत नीर मैं ठाढीँ, छिरकति जल अपनैं अपनैं रंग। ११
१६२ सूरसागर सार सटीक मुख भरि नीर परसपर डारतिं, सोभा अतिहिं अनूप बढ़ी तब। मनहु चंद-गन सुधा गंडूषनि, डारति हैं आनंद भरे सब। आईं निकसि जानु कटि लौं सब, अंजुरिन तैं लै लै जल डारतिं। मानहु सूर कनक-वल्ली जुरि, अमृत-बूँद पवन-मिस झारतिं ॥४०॥ अर्थ—राधा सखियों के साथ जल में विहार करती हैं। गले तक पानी में खड़ी अपने आप में मगन पानी छिड़कती है। मुँह में भरकर आपस में पानी डालती हैं तब अत्यधिक अनुपम शोभा बढ़ जाती है, मानो चन्द्रमा के समूह आनन्द से भरकर अपने मुख से अमृत के कुल्ले डाल रहे हों (इसी प्रकार गोपियां आनन्द से भरकर जल डालती हैं)। पुनः जाँघ तथा कमर तक पानी में सब निकलकर अंजुलियों से जल डालने लगीं। सूरदास कहते हैं मानो सोने की लतायें झुंडकर हवा के बहाने अमृत के बूंदों की झड़ी लगाती हैं ॥४०॥ जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी। तट ठाढ़े देखत नंद-नंदन, मधुरि मुरलि कर धारी। मोर-मुकुट, स्रवननि मनि कुंडल, जलज-माल उर भाजत। सुंदर सुभग स्याम तन नव घन, विच वग पाँति विराजत। उर बनमाल सुमन बहु भांतिनि, सेत, लाल, सित पीत। मनहुँ सुरसरी तट बैठे सुक, वरन वरन तजि भीत। पीतांबर कटि तट छुद्रावलि, बाजति परम रसाल। सूरदास मनु कनकभूमि ढिग, बोलत रुचिर मराल ॥४१॥ अर्थ—यमुना के जल में ब्रज की स्त्रियां विहार करती हैं। तट पर खड़े कृष्ण हाथ में मधुर मुरली लिए हुए देखते हैं। (सिर पर) मोर मुकुट, कानों में मणि का कुंडल और वक्षस्थल पर मोती की माला शोभित है। (माला ऐसे शोभित है जैसे) सुन्दर तथा सुभग कृष्ण के शरीर रूपी नये बादल के बीच बगुलों की पंक्ति शोभित हो। वक्षस्थल की वनमाला में सफेद, लाल, पीले तथा उज्ज्वल अनेक तरह के फूल हैं, मानो गंगा के किनारे भय छोड़कर तरह-तरह के रंगों के तोते बैठे हों। कमर पर पीताम्बर है तथा करधनी अत्यन्त आनन्ददायक ध्वनि करती है। सूरदास कहते हैं कि मानो सोने की भूमि के पास रुचिपूर्वक हंस बोल रहे हैं ॥४१॥ चितवनि रोके हूँ न रही। स्याम सुंदर सिंधु-सनमुख, सरित उमंगि बही। प्रेम-सलिल-प्रवाह भँवरनि, मिति, न कबहूँ लही। लोभ-लहर-कटाच्छ, घूँघट-पट-करार ढही। थके पल पथि, नाव धोरज परति नहिंन गही। मिली सूर सुभाव स्यामहिं, फेरिहू न चही ॥४२॥
राधाकृष्ण १६३ अर्थ-(गोपी की) दृष्टि रोकने पर भी न रुकी। श्याम सुन्दर रूपी समुद्र की ओर (दृष्टि रूपी) नदी उमगकर वह चली। प्रेम रूपी जल के प्रवाह की भँवरो (आंख की भौंहो) (कृष्ण से) की गहराई का अनुमान कभी (सुख) नही मिला। (मिलन) के लोभ तथा (आंख की) कटाक्ष रूपी लहर से घूंघट रूपी किनारा ढह गया। पलक रूपी पथिक थक गये। धीरज की नाव सम्हाली नही जाती। सूरदास कहते हैं कि यह दृष्टि स्वभावतः कृष्ण मे मिल गयी, फिर वापस हो कर भी नही देखा (मुडकर भी नही देखा) ॥४२॥ ' हमहिं कह्यौ हौँ स्याम दिखावहु । देखहु दरस नैन भरि नीकैं, पुनि-पुनि दरस न पावहु । बहुत लालसा करति रही तुम, वे तुम कारन आए । पूरी साध मिली तुम उनकौँ, यातैँ हमहिं भुलाए । नीकैँ सगुन आजु ह्याँ आईं, भयौ तुम्हारौ काज । सुनहु सूर हमकौँ कछु दैहौ, तुमहिँ मिले ब्रजराज ॥४३॥ अर्थ-हमसे (तुमने) कहा कि (हमे) कृष्ण को दिखाओ। अब सुन्दर (कृष्ण) को आंख भरकर देखो। वार-बार दर्शन नही पाओगी। तुम बहुत अभिलाषा करती रही। तुम्हारे ही कारण वह (यहाँ) आये हैं। तुम उनको मिल गयी जिससे तुम्हारी इच्छा पूरी हो गयी, इसी से तुमने हम लोगो को भुला दिया। आज शुभ अवसर (सगुन) था कि यहाँ आ गई जिससे तुम्हारा काम हो गया। सूरदास कहते हैं कि सखी राधा से कहती है, तुमको कृष्ण मिल गये अब हमको भी कुछ दोगी ? ॥४३॥ राधा चलहु भवनहिँ जाहिँ । कबहिँ की हम जमुना आईं, कहहिँ अरु पछिताहिँ । कियौ दरसन स्याम कौ तुम, चलौगी की नाहिं । बहुरि मिलिहौ चीन्हि राखहु, कहत, सब मुसुकाहिँ । हम चलीँ घर तुमहुँ आवहु, सोच भयौ मन माहिँ । सूर राधा सहित गोपी, चलीँ ब्रज-समुहाहिँ ॥४४॥ अर्थ-राधा चलो घर चले। हम लोग कब की यमुना आई है। सखियां (ऐसा) कहती और पछताती हैं। तुमने कृष्ण का दर्शन कर लिया (अब) चलोगी कि नही। फिर मिलोगी, पहचान रखो (ऐसा) कहकर सब सखियां हंसती है। हम घर चलती हैं तुम भी आओ (यह सुनकर राधा को) मन मे सोच हो गया। सूरदास कहते हैं कि राधा सहित गोपियां ब्रज की ओर (सम्मुख) चली ॥४४॥ कहि राधा हरि कैसे हैं। तेरैँ मन भए की नाहीँ, की सुदर, को नैंसे हैं। कौ पुनि हमहिँ दुराव करौगी, की कैहौँ वै जैसे हैं। की हम तुमसौँ कहति रहीँ ज्योँ, साँच कहौ की तैसे हैं।
१६४ सूरसागर सार सटीक नटवर-वेष काछनी काछे, अंगनि रति-पति-सै से हैं। सूर स्याम तुम नीकैं देखे, हम जानत हरि ऐसे हैं ॥४५॥ अर्थ--कहो राधा कृष्ण कैसे हैं ? तुम्हारे मन को अच्छे लगे कि नही । सुन्दर हैं कि बुरे हैं । फिर हमसे छिपाव करोगी, कि कहोगी कि वह जैसे हैं (होंगे) । या हम तुमसे जैसा कहती थी, सच्ची कहो वैसे हैं (कि नही) । नटवर वेष पर काछनी पहने (कृष्ण के) अंग सैकडो कामदेव के समान हैं; सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती हैं) तुमने अच्छी तरह से देखा (या नही) हम तो जानती ही हैं कि कृष्ण इस तरह (सुन्दर) हैं ॥४५॥ स्याम सखि नीकैं देखे नाहिं। चितवत ही लोचन भरि आए, वार-वार पछिताहिं । कैसेहुँ करि इकटक मैं राखति, नैकहिं मैं अकुलाहिं । निमिष मनौ छवि पर रखवारे, तातैं अतिहिं डराहिं । कहा करूँ इनकौ कह दूषन, इन अपनी सी कीन्ही । सूर स्याम-छवि पर मन अटक्यौ, उन सब सोभा लोन्ही ॥४६॥ अर्थ-हे सखी कृष्ण को अच्छी तरह देखा नही, देखते ही आंखें भर आयी और (मैं) वार-वार पछताने लगी । किसी तरह मैं (आंखों को) एकटक रखती लेकिन वे जल्दी ही आकुल हो जाती थी । मानो निमिष शोभा की रखवाली कर रहे हों, उसी से अत्यधिक डरते हों । इनको दोष देकर क्या करे, इन्होने तो अपना सा किया । सूर- दास कहते हैं कि (राधा कहती है) मन कृष्ण की छवि पर अटक गया किन्तु उन (नेत्रो ही) ने सब शोभा ले ली ॥४६॥ राधा का अनुराग पुनि-पुनि कहति हैं ब्रज नारि । धन्य बड़ भागिनी राधा, तेरैं वस गिरिधारि । धन्य नंद-कुमार धनि तुम, धन्य तेरी प्रीति । धन्य दोउ तुम नवल जोरी, काम कलानि जीति । हम विमुख, तुम कृष्ण संगिनी, प्रान इक, द्वै देह । एक मन, इक बुद्धि, इक चित, दुहुँनि एक सनेह । एक छिनु विनु तुम्हहिं देखैं, स्याम धरत न धीर । मुरलि मैं तुम नाम पुनि पुनि, कहत हैं बलवीर । स्याम मनि तैं परखि लीन्हौं, महा चतुर सुजान । सूर के प्रभु प्रेमही बस, कौन तो सरि आन ॥४७॥ अर्थ--बार-बार ब्रज की स्त्रियां कहती हैं कि बड़े भाग्यवाली राधा तू धन्य है, क्योकि कृष्ण तुम्हारे वश मे हैं । कृष्ण धन्य हैं, तुम धन्य हो तथा तुम्हारी प्रीति धन्य है । काम की कलाओ को जीतने वाली तुम दोनों की नयी जोड़ी धन्य है । हम (कृष्ण से) विमुख हैं, तुम कृष्ण की संगिनी हो, (तुम दोनों का) प्राण एक है और शरीर दो