भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

१६२ सूरसागर सार सटीक मुख भरि नीर परसपर डारतिं, सोभा अतिहिं अनूप बढ़ी तब। मनहु चंद-गन सुधा गंडूषनि, डारति हैं आनंद भरे सब। आईं निकसि जानु कटि लौं सब, अंजुरिन तैं लै लै जल डारतिं। मानहु सूर कनक-वल्ली जुरि, अमृत-बूँद पवन-मिस झारतिं ॥४०॥ अर्थ—राधा सखियों के साथ जल में विहार करती हैं। गले तक पानी में खड़ी अपने आप में मगन पानी छिड़कती है। मुँह में भरकर आपस में पानी डालती हैं तब अत्यधिक अनुपम शोभा बढ़ जाती है, मानो चन्द्रमा के समूह आनन्द से भरकर अपने मुख से अमृत के कुल्ले डाल रहे हों (इसी प्रकार गोपियां आनन्द से भरकर जल डालती हैं)। पुनः जाँघ तथा कमर तक पानी में सब निकलकर अंजुलियों से जल डालने लगीं। सूरदास कहते हैं मानो सोने की लतायें झुंडकर हवा के बहाने अमृत के बूंदों की झड़ी लगाती हैं ॥४०॥ जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी। तट ठाढ़े देखत नंद-नंदन, मधुरि मुरलि कर धारी। मोर-मुकुट, स्रवननि मनि कुंडल, जलज-माल उर भाजत। सुंदर सुभग स्याम तन नव घन, विच वग पाँति विराजत। उर बनमाल सुमन बहु भांतिनि, सेत, लाल, सित पीत। मनहुँ सुरसरी तट बैठे सुक, वरन वरन तजि भीत। पीतांबर कटि तट छुद्रावलि, बाजति परम रसाल। सूरदास मनु कनकभूमि ढिग, बोलत रुचिर मराल ॥४१॥ अर्थ—यमुना के जल में ब्रज की स्त्रियां विहार करती हैं। तट पर खड़े कृष्ण हाथ में मधुर मुरली लिए हुए देखते हैं। (सिर पर) मोर मुकुट, कानों में मणि का कुंडल और वक्षस्थल पर मोती की माला शोभित है। (माला ऐसे शोभित है जैसे) सुन्दर तथा सुभग कृष्ण के शरीर रूपी नये बादल के बीच बगुलों की पंक्ति शोभित हो। वक्षस्थल की वनमाला में सफेद, लाल, पीले तथा उज्ज्वल अनेक तरह के फूल हैं, मानो गंगा के किनारे भय छोड़कर तरह-तरह के रंगों के तोते बैठे हों। कमर पर पीताम्बर है तथा करधनी अत्यन्त आनन्ददायक ध्वनि करती है। सूरदास कहते हैं कि मानो सोने की भूमि के पास रुचिपूर्वक हंस बोल रहे हैं ॥४१॥ चितवनि रोके हूँ न रही। स्याम सुंदर सिंधु-सनमुख, सरित उमंगि बही। प्रेम-सलिल-प्रवाह भँवरनि, मिति, न कबहूँ लही। लोभ-लहर-कटाच्छ, घूँघट-पट-करार ढही। थके पल पथि, नाव धोरज परति नहिंन गही। मिली सूर सुभाव स्यामहिं, फेरिहू न चही ॥४२॥

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 163, कुल 359 में से · BharatKosha