सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १६३ अर्थ-(गोपी की) दृष्टि रोकने पर भी न रुकी। श्याम सुन्दर रूपी समुद्र की ओर (दृष्टि रूपी) नदी उमगकर वह चली। प्रेम रूपी जल के प्रवाह की भँवरो (आंख की भौंहो) (कृष्ण से) की गहराई का अनुमान कभी (सुख) नही मिला। (मिलन) के लोभ तथा (आंख की) कटाक्ष रूपी लहर से घूंघट रूपी किनारा ढह गया। पलक रूपी पथिक थक गये। धीरज की नाव सम्हाली नही जाती। सूरदास कहते हैं कि यह दृष्टि स्वभावतः कृष्ण मे मिल गयी, फिर वापस हो कर भी नही देखा (मुडकर भी नही देखा) ॥४२॥ ' हमहिं कह्यौ हौँ स्याम दिखावहु । देखहु दरस नैन भरि नीकैं, पुनि-पुनि दरस न पावहु । बहुत लालसा करति रही तुम, वे तुम कारन आए । पूरी साध मिली तुम उनकौँ, यातैँ हमहिं भुलाए । नीकैँ सगुन आजु ह्याँ आईं, भयौ तुम्हारौ काज । सुनहु सूर हमकौँ कछु दैहौ, तुमहिँ मिले ब्रजराज ॥४३॥ अर्थ-हमसे (तुमने) कहा कि (हमे) कृष्ण को दिखाओ। अब सुन्दर (कृष्ण) को आंख भरकर देखो। वार-बार दर्शन नही पाओगी। तुम बहुत अभिलाषा करती रही। तुम्हारे ही कारण वह (यहाँ) आये हैं। तुम उनको मिल गयी जिससे तुम्हारी इच्छा पूरी हो गयी, इसी से तुमने हम लोगो को भुला दिया। आज शुभ अवसर (सगुन) था कि यहाँ आ गई जिससे तुम्हारा काम हो गया। सूरदास कहते हैं कि सखी राधा से कहती है, तुमको कृष्ण मिल गये अब हमको भी कुछ दोगी ? ॥४३॥ राधा चलहु भवनहिँ जाहिँ । कबहिँ की हम जमुना आईं, कहहिँ अरु पछिताहिँ । कियौ दरसन स्याम कौ तुम, चलौगी की नाहिं । बहुरि मिलिहौ चीन्हि राखहु, कहत, सब मुसुकाहिँ । हम चलीँ घर तुमहुँ आवहु, सोच भयौ मन माहिँ । सूर राधा सहित गोपी, चलीँ ब्रज-समुहाहिँ ॥४४॥ अर्थ-राधा चलो घर चले। हम लोग कब की यमुना आई है। सखियां (ऐसा) कहती और पछताती हैं। तुमने कृष्ण का दर्शन कर लिया (अब) चलोगी कि नही। फिर मिलोगी, पहचान रखो (ऐसा) कहकर सब सखियां हंसती है। हम घर चलती हैं तुम भी आओ (यह सुनकर राधा को) मन मे सोच हो गया। सूरदास कहते हैं कि राधा सहित गोपियां ब्रज की ओर (सम्मुख) चली ॥४४॥ कहि राधा हरि कैसे हैं। तेरैँ मन भए की नाहीँ, की सुदर, को नैंसे हैं। कौ पुनि हमहिँ दुराव करौगी, की कैहौँ वै जैसे हैं। की हम तुमसौँ कहति रहीँ ज्योँ, साँच कहौ की तैसे हैं।