सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ सूरसागर सार सटीक नटवर-वेष काछनी काछे, अंगनि रति-पति-सै से हैं। सूर स्याम तुम नीकैं देखे, हम जानत हरि ऐसे हैं ॥४५॥ अर्थ--कहो राधा कृष्ण कैसे हैं ? तुम्हारे मन को अच्छे लगे कि नही । सुन्दर हैं कि बुरे हैं । फिर हमसे छिपाव करोगी, कि कहोगी कि वह जैसे हैं (होंगे) । या हम तुमसे जैसा कहती थी, सच्ची कहो वैसे हैं (कि नही) । नटवर वेष पर काछनी पहने (कृष्ण के) अंग सैकडो कामदेव के समान हैं; सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती हैं) तुमने अच्छी तरह से देखा (या नही) हम तो जानती ही हैं कि कृष्ण इस तरह (सुन्दर) हैं ॥४५॥ स्याम सखि नीकैं देखे नाहिं। चितवत ही लोचन भरि आए, वार-वार पछिताहिं । कैसेहुँ करि इकटक मैं राखति, नैकहिं मैं अकुलाहिं । निमिष मनौ छवि पर रखवारे, तातैं अतिहिं डराहिं । कहा करूँ इनकौ कह दूषन, इन अपनी सी कीन्ही । सूर स्याम-छवि पर मन अटक्यौ, उन सब सोभा लोन्ही ॥४६॥ अर्थ-हे सखी कृष्ण को अच्छी तरह देखा नही, देखते ही आंखें भर आयी और (मैं) वार-वार पछताने लगी । किसी तरह मैं (आंखों को) एकटक रखती लेकिन वे जल्दी ही आकुल हो जाती थी । मानो निमिष शोभा की रखवाली कर रहे हों, उसी से अत्यधिक डरते हों । इनको दोष देकर क्या करे, इन्होने तो अपना सा किया । सूर- दास कहते हैं कि (राधा कहती है) मन कृष्ण की छवि पर अटक गया किन्तु उन (नेत्रो ही) ने सब शोभा ले ली ॥४६॥ राधा का अनुराग पुनि-पुनि कहति हैं ब्रज नारि । धन्य बड़ भागिनी राधा, तेरैं वस गिरिधारि । धन्य नंद-कुमार धनि तुम, धन्य तेरी प्रीति । धन्य दोउ तुम नवल जोरी, काम कलानि जीति । हम विमुख, तुम कृष्ण संगिनी, प्रान इक, द्वै देह । एक मन, इक बुद्धि, इक चित, दुहुँनि एक सनेह । एक छिनु विनु तुम्हहिं देखैं, स्याम धरत न धीर । मुरलि मैं तुम नाम पुनि पुनि, कहत हैं बलवीर । स्याम मनि तैं परखि लीन्हौं, महा चतुर सुजान । सूर के प्रभु प्रेमही बस, कौन तो सरि आन ॥४७॥ अर्थ--बार-बार ब्रज की स्त्रियां कहती हैं कि बड़े भाग्यवाली राधा तू धन्य है, क्योकि कृष्ण तुम्हारे वश मे हैं । कृष्ण धन्य हैं, तुम धन्य हो तथा तुम्हारी प्रीति धन्य है । काम की कलाओ को जीतने वाली तुम दोनों की नयी जोड़ी धन्य है । हम (कृष्ण से) विमुख हैं, तुम कृष्ण की संगिनी हो, (तुम दोनों का) प्राण एक है और शरीर दो