भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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हैं। एक ही मन, एक ही बुद्धि, एक चित् तथा दोनो का एक ही स्नेह है। बिना तुम्हे देखे कृष्ण एक भी क्षण धैर्य नही धरते है। कृष्ण मुरली में तुम्हारा नाम बार-बार कहते है। महा चतुर, सुजान कृष्ण ने मन से परख लिया। सूरदास कहते है कि कृष्ण प्रेम ही के वश मे हैं। (राधा) तुम्हारे समान और कौन है ? ॥४७॥ राधा परम निर्मल नारि । कहति हौँ मन कर्मना करि, हृदय-दुविधा टारि । स्याम कौँ इक तुहीँ जान्यौ, दुराचारिनि और । जैसेँ घट पूरन न डोलै, अध भरी डगडौर । धनी धन कबहूँ न प्रगटै, धरै ताहि छपाइ । तैँ महानग स्याम पायौ, प्रगटि कैसैँ जाइ । कहति हौँ यह बात तोसौँ, प्रगट करिहौँ नाहिं । सूर सखी सुजान राधा, परस्पर मुसुकाहिँ ॥४८॥ अर्थ—राधा परम स्वच्छ स्त्री है। मैं मन और कर्म से दुविधा टालकर कहती हूँ। कृष्ण को केवल तुम्ही ने जाना और (स्त्रियां तो) दुराचारिणी हैं। जैसे भरा हुआ घड़ा हिलता-डुलता नही, किन्तु आधा भरा (घड़ा) डगमगाता रहता है। धनी धन को कभी प्रकट नही करता, उसे छिपाकर रखता है, उसी तरह तुमने महामणि कृष्ण को पाया है, उसे प्रकट कैसे किया जाय। मैं तुमसे यह बात कहती हूँ कि (तुम) इसे प्रकट नही करोगी। सूरदास कहते हैं कि सखी तथा सुजान राधा आपस में मुसकाती हैं ॥४८॥ तैँ ही स्याम भले पहिचाने । साँची प्रीति जानि मनमोहन, तेरेहिँ हाथ बिकाने । हम अपराध कियौ कहि तुमसौँ, हमहीँ कुलटा नारि । तुमसौँ उनसौँ बीच नहीं कछु, तुम दोऊ बर-नारि । धन्य सुहाग भाग है तेरौँ, धनि बड़भागी स्याम । सूरदास-प्रभु से पति जाकैँ, तोसी जाकैँ बाम ॥४९॥ अर्थ--तुमने ही कृष्ण को भली-भांति पहचाना। कृष्ण सच्चा प्रेम जानकर तेरे ही हाथ बिक गये। हमने तुमसे कहकर अपराध किया क्योकि हम कुलटा स्त्री हैं। तुममें और उन (कृष्ण) मे कुछ अन्तर नही है, तुम दोनो पति-पत्नी हो। तुम्हारा सुहाग तथा भाग्य धन्य है, तथा बड़े भाग्य वाले कृष्ण धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण जैसे जिसके पति है और तुम जैसी जिनकी पत्नी है (उसका भाग्य) निश्चय ही सराहनीय है ॥४९॥ राधा स्याम की प्यारी । कृष्ण पति सर्वदा तेरे, तू सदा नारी । सुनत बानी सखी-मुख की, जिय भयौ अनुराग । प्रेम-गदगद, रोम पुलकित, समुझि अपनौ भाग ।