सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ सूरसागर सार सटीक
प्रीति परगट कियौ चाहैं, बचन बोलि न जाइ । नंद-नंदन काम-नायक, रहे नैननि छाइ । हृदय तैं कहूँ टरत नाहीं, कियौ निहचल बास । सूर प्रभु-रस भरी राधा, दुरत नहीं प्रकास ॥५०॥ अर्थ—राधा कृष्ण की प्यारी हैं। कृष्ण सदा तुम्हारे पति हैं तथा तू सदा उनकी स्त्री है। सखी के मुँह से वाणी सुनकर हृदय मे प्रेम हुआ। अपने भाग्य को समझकर (वह) प्रेम से गद्गद हो गयी तथा (उसके) रोम पुलकित हो गये। प्रेम प्रकट करना चाहती है लेकिन कुछ कहा ही नही जाता । काम के नायक कृष्ण आंखो मे छा गये। हृदय से कही टलते नही वहीं निश्चित रूप से बस गये। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के प्रेम से भरी राधा के हृदय का उल्लास छिपता नही ॥५०॥ जौ बिधना अपबस करि पाऊँ । तो सखि कह्यौ होइ कछु तेरौ, अपनी साध पुराऊँ । लोचन रोम-रोम-प्रति माँगौँ, पुनि-पुनि त्रास दिखाऊँ । इकटक रहैँ पलक नहिँ लागैँ, पद्धति नई चलाऊँ । कहा करौँ छवि-रासि स्यामघन, लोचन द्वै नहिँ ठाऊँ । एते पर ये निमिष सूर सुनि, यह दुख काहि सुनाऊँ ॥५१॥ अर्थ—यदि ब्रह्मा को अपने वश मे कर पाऊँ तो सखी तुम्हारा कहना कुछ होगा और मैं अपनी इच्छा पूरी कर पाऊँ । प्रत्येक रोम मे, लोचन मे मांगू ओर उन आंखो को बार-बार भयभीत करूँ कि वे एकटक देखती रहें तथा पलक न भाँजे । इस तरह नयी परिपाटी चला दूँ । क्या करूँ कृष्ण रूप की राशि है और इन दोनो आंखो मे स्थान कहाँ है। सूरदास कहते है कि (राधा सखी से कहती है) सुनो (सखी) इतने पर इन आंखों मे पलक झपकने से निमिष होता है, इसका दुःख किससे कहूँ ॥५१॥ कहि राधिका बात अब साँची। तुम अब प्रगट कही मो आगैँ, स्याम-प्रेम-रस माँची। तुमकौँ कहाँ मिले, नंद-नंदन, जब उनकैँ रंग राँची। खरिक मिले, की गोरस बेचत, की जब बिषहर वांची। कहै बनै छाँड़ौ चतुराई, बात नहीं यह काँची । सूरदास राधिका सयानी, रूप-रासि-रस-खाँची ॥५२॥ अर्थ—राधा अब सच्ची बात कहो। अब तुमने मेरे आगे प्रकट रूप से कहा कि तुम कृष्ण के प्रेम रस मे डूबी हो । तुमको कृष्ण कहाँ मिले, जब से उनके रंग मे रंग गयी । गायो के बाँधे जाने के स्थान पर मिले थे, कि गोरस बेचते समय, या जब सांप (के काटने) से (उनके बचाने पर) बची थी । अब कहते ही के बनेगा चतुराई छोड़िये, यह बात कच्ची नही है। सूरदास कहते हैं कि सयानी राधा (कृष्ण के) (रूप की राशि के रस के खिची है) अनन्त रूप सौन्दर्य के आनन्द से आकर्षित हुई है ॥५२॥