भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 359 में से

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कब री मिले स्याम नहिँ जानौँ । तेरी सौँ करि कहति सखी री, अजहूँ नहिँ पहिचानौँ । खरिक मिले, की गोरस बेँचत, की अबहीँ, की कालि । नैननि अंतर होत न कवहूँ, कहति कहा री आलि । एकौ पल हरि होत न न्यारैँ, नीकैँ देखे नाहिँ । सूरदास-प्रभु टरत न टारैँ, नैननि सदा बसाहिँ ॥५३॥ अर्थ-कृष्ण कब मिले थे, मैं नही जानती। सखी, तुम्हारी सौगन्ध लेकर कहती हूँ कि अब भी नही पहचानती हूँ। पशुओ के बाड़े मे मिले थे, कि गोरस बेंचते समय, कि अभी मिले या कल। निगाह से अलग कभी होते ही नही, सखी तू क्या कहती है। एक भी पल कृष्ण अलग नही हो रहे है, (क्योकि उनको) अच्छी तरह से देख ही नही पाई। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) कृष्ण नैनो मे बस गये हैं, टालने से टलते नही ॥५३॥ स्याम मिले मोहिं ऐसैँ माई। मैं जल कौँ जमुना तट आई ॥ औचक आए तहाँ कन्हाई । देखत ही मोहिनी लगाई ॥ तबहीँ तैँ तन-सुरति गँवाई। सूधैँ मारग गई भुलाई ॥ बिनु देखेँ कल परै न माई। सूर स्याम मोहिनी लगाई ॥५४॥ अर्थ-सखी मुझे कृष्ण ऐसे मिले। मैं यमुना के किनारे जल भरने के लिए गयी थी। वहां अचानक कृष्ण आ गये। देखते ही मोहनी लगा दी। तभी से शरीर की सुध खो दी। (मैं) सीधे मार्ग मे भूल गयी। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) हे सखी तब से बिना देखे चैन नही पड़ती। (क्योकि) कृष्ण ने मोहिनी लगा दी है ॥५४॥ तबहीँ तैँ हरि हाथ बिकानी। देह-गेह-सुधि सबै भुलानी ॥ अंग सिथिल भए जैसैँ पानी। ज्यौँ-त्यौँ करि गृह पहुँची आनी ॥ बोले तहाँ अचानक बानी। द्वारैँ देखे स्याम बिनानी ॥ कहा कहौँ सुनि सखी सयानी। सूर स्याम ऐसी मति ठानी ॥५५॥ अर्थ-तभी से मैं कृष्ण के हाथ बिक गयी। शरीर और घर सब कुछ भूल गयी। शरीर पानी की तरह शिथिल हो गया। जैसे-तैसे घर पहुँच पायी। वहाँ से अचानक (कृष्ण) वाणी बोले। (तब) मैने द्वार पर विज्ञानी कृष्ण को देखा। सुनो सयानी सखी क्या कहूँ, कृष्ण ने बुद्धि से ऐसा दृढ सकल्प किया ॥५५॥ जा दिन तैँ हरि दृष्टि परे री। ता दिन तैँ मेरैँ इन नैननि, दुख सुख सब बिसरे री। मोहन अंग गुपाल लाल के, प्रेम-पियूष भरे री। बसे उहाँ मुसुकानि-बाँह लैँ, रचि रुचि भवन करे री। पठवति हौँ मन, तिनहिँ मनावन, निसदिन रहत अरे री। ज्यौँ ज्यौँ जतन, करति उलटावति, त्यौँ त्यौँ उठत खरे री।

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