सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ सूरसागर सार सटीक पचिहारी समुझाइ नीच-ऊंच, पुनि-पुनि पाँइ परे री। सो सुख सूर कहाँ लौँ बरनौँ, इक टक तैं न टरे री ॥५६॥ अर्थ—जिस दिन से कृष्ण दिखाई पड़े, उसी दिन से मेरी इन आँखो का दुःख- सुख सब भूल गया। गोपाल कृष्ण के मोहने वाले अङ्गो के प्रेम का अमृत इन आँखो मे भर गया है। इन नेत्रों ने कृष्ण की मुस्कान का आश्रय लेकर वहाँ रुचिपूर्वक बना- सँवार कर अपना घर कर लिया है। मन को उन्हे मनाने के लिए भेजती हूँ, (क्योकि) वे (वहाँ) रात-दिन अडे रहते हैं। ज्यो-ज्यो यत्न करके वापस करवाती हूँ, त्यो-त्यो वे ओर तेज हो जाते थे। बार-बार पैर पकड़कर, बार-बार ऊँचा-नीचा समझाकर हार गयी। सूरदास कहते है (राधा कहती है) उस सुख का वर्णन कहाँ तक करूँ, (वे आँखें) एक टक से (कभी) टली नही ॥५६॥ जब तैं प्रीति स्याम सौँ कीन्हीँ । ता दिन तैं मेरैं इन नैननि, नैंकहुँ नीँद न लीन्ही । सदा रहै मन चाक चढ़्यौ, सो और न कछू सुहाइ । करत उपाइ बहुत मिलिवे कौँ, यहै विचारत जाइ । सूर सकल लागति ऐसीयै, सो दुख कासौं कहियै । ज्यौँ अचेत बालक कौ वेदन, अपनैं ही तन सहियै ॥५७॥ अर्थ—जिस दिन से कृष्ण से प्रेम किया, उसी दिन से मेरी इन आँखो ने किंचित नीद नही ली। मन सदा चाक पर चढा रहता है, इसी से और कुछ अच्छा नही लगता। सदा मिलने का उपाय करती हूँ, यह विचारती जाती हूँ। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) यह सब कुछ ऐसा लगता है कि इस दुःख को किससे कहा जाय। अचेत बालक के दुःख की तरह इसे अपने ही शरीर मे सहते रहना है ॥५७॥ ना जानौँ तबहीँ तैं मोकीँ, स्याम कहा धौँ कीन्हौ री। मेरी दृष्टि परी जा दिन तैं, ज्ञान ध्यान हरि लीन्हौ री । द्वारैँ आइ गए औचक हीँ, मैं आँगन ही ठाढ़ी री । मनमोहन-मुख देखि रही तब, काम-विथा तनु बाढ़ी री । नैन-सैन दै दै हरि मो तन, कछु इक भाव बतायौ री । पीतांबर उपरैना कर गहि, अपनैं सीस फिरायौ री । लोक-लाज, गुरुजन की संका, कहत न आवै बानी री । सूर स्याम मेरैं आँगन आए, जात बहुत पछितानी री ॥५८॥ अर्थ—मालूम नही तभी से कृष्ण ने मुझे क्या कर दिया। मेरी निगाह जिस दिन से पड़ी उसी दिन से इन्होने (मेरा) ज्ञान, ध्यान सब कुछ हर लिया। वे अचानक ही द्वार पर आ गये, मैं आँगन मे खड़ी थी। मनमोहन के मुख को देखकर शरीर मे काम की पीड़ा बढ गयी। उन्होने आँखों से इशारा करके मेरी ओर कुछ एक भाव प्रकट किया। पीताम्बर के उत्तरीय को हाथ से पकड़कर अपने सिर के चारो ओर फिरा