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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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लिया (मानो घूंघट निकाल लिया)। लोक की लाज तथा गुरुजनो की शंका से वाणी कही नही जाती। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण मेरे आँगन आये, (उनको) जाते हुए जानकर मैं बहुत पछतायी ॥५८॥ मैँ अपनौ मन हरत न जान्यौ। कीधौँ गयौ संग हरि कैँ वह, कीधौँ पंथ भुलान्यौ। कीधौँ स्याम हटकि है राख्योँ, कीधौँ आपु रतान्यौ। काहे तैँ सुधि करी न मेरी, मोपै कहा रिसान्यौ। जबहीँ तैँ हरि ह्वाँ ह्रै निकसे, बैरु तबहिँ तैँ ठान्यौ। सूर स्याम संग चलन कह्यौ मोहिँ, कह्यौ नहीँ तब मान्यौ ॥५९॥ अर्थ—मैंने अपने मन को हरते हुए नही जाना। वह कृष्ण के साथ गया कि (कही) रास्ते मे भूल गया। उसे कृष्ण ने रोक रखा है या वह कृष्ण पर स्वयं रत हो गया है। उसने मेरा ख्याल किस कारण से नही किया, मुझ पर क्यो नाराज हो गया। जब से कृष्ण यहाँ से निकले तभी से इनसे शत्रुता ठान ली। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) (मन ने) कृष्ण के साथ चलने के लिए मुझसे कहा, तब मैने (उसका) कहना नही माना ॥५९॥ स्याम करत हैं मन की चोरी। कैसैँ मिलत आनि पहलैँ हीँ, कहि-कहि बतियाँ भोरी। लोक-लाज की कानि गँवाई, फिरति गुड़ी बस डोरी। ऐसैँ ढंग स्याम अब सीख्यौ, चोर भयौ चित कौ री। माखन की चोरी सहि लीन्हीँ, बात रही वह थोरी। सूर स्याम भयौ निडर तबहिँ तैँ, गोरस लेत अँजोरी ॥६०॥ अर्थ—कृष्ण मन की चोरी करते है। पहले ही आकर कैसे भोली बातें कह-कह कर मिलते हैं। लोक-लाज की मर्यादा गँवाकर, डोरी के वश में हुई पतंग की तरह फिरती हूँ। अब कृष्ण ने ऐसा ढंग सीख लिया है कि वे चित्त के चोर हो गये हैं। माखन की चोरी सह ली क्योंकि वह थोड़ी-सी बात थी। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण तभी से ढीठ हो गये, जब से वे गोरस छीन-झपटकर ले लेते थे ॥६०॥ माई कृष्ण-नाम जब तैँ श्रवन सुन्यौ है री, तब तैँ भूली री मौन बावरी सी भई री। भरि भरि आवैँ नैन, चित न रहत चैन वैन नहिँ सूधौ दसा औरहिँ ह्रै गई री। कौन माता, कौन पिता, कौन भैनी, कौन भ्राता, कौन ज्ञान, कौन ध्यान, मनमथ हुई री। सूर स्याम जब तैँ परै री मेरी डीठि, वाम, काम, धाम, लोक-लाज, कुल-कानि नई री ॥६१॥