भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 150

राधाकृष्ण १४६ सौगंध देकर बुलाया है। सूरदास कहते हैं गुणो के भांडार कृष्ण ने नागरि राधा को बहुत रिझाया ॥७॥ नाम कहा तेरौ री प्यारी। बेटी कौन महर की है तू, को तेरी महतारी। धन्य कोख जिहिँ तोकौँ राख्यो, धनि घरि जिहिँ अवतारी। धन्य पिता माता तेरे, छवि निरखति हरि-महतारी। मैं बेटी वृषभानु महर की, मैया तुमकौँ जानतिँ। जमुना-तट बहु बार मिलन भयौ, तुम नाहिँन पहिचानतिँ । ऐसी कहि, वाकौँ मैं जानति, वह तो बड़ी छिनारि। महर बड़ौ लंगर सब दिन कौ, हँसति देति मुख गारि । राधा बोलि उठी, बाबा कछु, तुमसौ ढीठौ कीन्हौ। ऐसे समरथ कव मैं देखे, हँसि प्यारिहिँ उर लीन्हौ। महरि कुँवरि सौँ यह कहि भाषति, आउ करौँ तेरी चोटी। सूरदास हरषित नंदरानी, कहति महरि हम जोटी ॥८॥ अर्थ - प्यारी तेरा क्या नाम है। तू कौन महर की बेटी है और कौन तुम्हारी माता है। वह कोख धन्य है जिसने तुझको रखा और वह (माता) धन्य है जिसने तुम्हें जन्म दिया। तुम्हारे पिता, माता (दोनो) धन्य है। (इस प्रकार) कृष्ण की माता (उसकी) छवि देखती हैं। (राधा उत्तर देती है) मैं वृषभानु महर की पुत्री हूँ, माता तुमको जानती हूँ। यमुना के तट पर बहुत बार मिलन हुआ है, (क्या) तुम नही पहचानती हो। ऐसा कहो, उसको मैं जानती हूँ, वह तो बहुत कुलटा है। महर (वृषभानु भी) सब दिन के वडे धृष्ट हैं, इस प्रकार (यशोदा) हँसती और मुंह से गाली देती है। राधा (इस पर) वोल उठी कि वावा ने क्या तुमसे कुछ धृष्टता की है। इस पर यशोदा ने कहा ऐसे समर्थ उनको मैंने कब देखा ? फिर हँस कर प्यारी राधा को हृदय से लगा लिया। यशोदा कुँवरि राधा से यह कहती है - आओ तुम्हारी चोटी करूँ । सूरदास कहते हैं नन्दरानी प्रसन्न होती हैं और कहती है कि महरि और हम जोड़ी है ॥८॥ जसुमति राधा:कुँवरि सँवारति । बड़े वार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरुवारति । माँग पारि वेनी जु सँवारति, गूँथी सुन्दर भाँति । गोरैँ भाल बिंदु बदन, मनु इन्दु प्रात-रवि काँति । सारी चीरि नई फरिया लै, अपने हाथ बनाइ । अंचल सौँ मुख पोँछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ । तिल, चाँवरी, बतासे, मेवा, दियौ कुँवरि की गोद । सूर स्याम-राधा तनु चितवत, जसुमति मन-मन मोद ॥६॥