सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० सूरसागर सार सटीक अर्थ—यशोदा कुमारी राधा को सँवारती हैं। फिर की मांग के बढ़े बालो को प्रेम के साथ सुलझाती हैं। उन्होंने मांग काढ़कर, चोटी को सँवारकर, सुन्दर तरह से गूंथा। गोरे मस्तक (और गोरे) मुख पर विन्दी ऐसी शोभित है मानो चन्द्रमा तथा प्रातः कालीन सूर्य की कांति एक साथ शोभित हो रही हो। यशोदा ने साड़ी को चीर कर अपने हाथ से नया लहँगा बनाया, फिर अपने आंचल से राधा के मुख तथा अन्य सब अङ्गो को पोछ कर उन्होंने अपने हाथ से लहँगा पहना दिया। इसके उपरान्त तिल, चावल, बतासा और मेवा से कुँवरि (राधा) की गोद भरी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और राधा की ओर देखते हुए यशोदा मन-ही-मन आनन्दित हैं ॥६॥ बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी । किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिँ कच गूँदि माँग सिर पारी । खेलत रही नंद कैँ आँगन, जसुमति कही कुँवरि ह्वाँ आ री । मेरौ नाउँ बूझि बाबा कौ, तेरौ बूझि दई हँसि गारी । तिल, चाँवरी गोद करि दीनी, फरिया दई फारि नव सारी । मो तन चितै, चितै ढोटा-तन, कछु सविता सौँ गोद पसारी । या सुनि कै वृषभानु मुदित चित, हँसि-हँसि बूझत बात दुलारी । सूर सुनत रस-सिन्धु बढ्यौ अति, दम्पति एकै बात विचारी ॥१०॥ अर्थ—माता पूछती हैं कि प्यारी तुम कहाँ थी। किसने तुम्हारे मस्तक पर तिलक की रचना की है, किसने बालों को गूंथ (सुलझा) कर सिर की मांग निकाली है। (राधा उत्तर देती है) जब मैं नंद के आंगन मे खेल रही थी, तब यशोदा ने कहा कुँवरि यहाँ आओ। मेरा नाम पूछा और बाबा का नाम पूछा, फिर तुम्हारा नाम पूछ कर हँसते हुए गाली दी। तिल और चावल से (मेरी) गोद भर दी तथा नयी साड़ी फाड़कर लहँगा पहनाया। मेरी ओर देखकर और पुत्र की ओर देखकर उन्होने सूर्य की ओर आंचल पसार कर कुछ प्रार्थना की। यह सुनकर वृषभानु प्रसन्न मन से हँस-हँसकर प्यारी राधा से बात पूछते है। सूरदास कहते है कि (यह सब) सुनते ही दंपति के हृदय मे रस. का सागर अत्यधिक उमड़ आया और दोनो के मन मे एक ही विचार उठा ॥१०॥ गारुड़ी कृष्ण सखियनि मिलि राधा घर लाईं । देखहु महरि सुता अपनी कौँ, कहुँ इहिँ कारैँ खाई । हम आगैँ आवति, यह पाछैँ, धरनि परी भहराई । सिर तैँ गई दोहनी ढरिकै, आपु रही मुरझाई । स्याम-भुअंग डस्यौ हम देखत, ल्यावहु गुनी बुलाई । रोवति जननि कंठ लपटानी, सूर स्याम गुन राई ॥११॥