सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १५१ अर्थ—सखियाँ मिलकर राधा को घर ले आयी और कहने लगी, महरि अपनी बेटी को देखो, कही इसे सांप ने काट लिया है। हम सब आगे-आगे आ रही थीं, पीछे यह जमीन पर गिर पड़ी। सिर से दोहनी (दूध की हांड़ी) ढुलक गयी, स्वयं मुरझा गयी। हमारे देखते इसे काले सांप ने डस लिया, किसी गुणी को बुला लाओ। रोती हुई माता कंठ से लिपटकर कहती है कि कृष्ण ही गुणियो मे श्रेष्ठ हैं ॥१११॥ नंद-सुवन गारुड़ी बुलावहु। कह्यौ हमारौ सुनत न कोऊ, तुरत जाहु, लै आवहु। ऐसौ गुनी नहीं त्रिभुवन कहूँ, हम जानतिँ हैं नीकै। आइ जाइ तौ तुरत जियावहिँ, नैँकु छुवत उठै जी कै। देखौ धौँ यह बात हमारी, एकहि मन्त्र जिवावै। नन्द महर कौ सुत सूरज जौ, कैसेहुँ ह्याँ लौ आवै ॥१२॥ अर्थ-गारुड़ी नंद के पुत्र (कृष्ण) को बुलाओ। हमारा कहना तो कोई सुनता नही, तुरन्त जाकर ले आओ। ऐसा सांप के मंत्र को जानने वाला तीनो लोक मे कोई नही है। हम उसे अच्छी तरह जानती हैं। आ जायँ तो तुरन्त जिला दे, तनिक छूते ही जी कर उठ जाय। हमारी यह बात निश्चय करके देखो एक ही मंत्र मे वह जिला देता है। नन्द महर के पुत्र को कैसे भी यहाँ पर ले आया जाय ॥१२॥ महरि, गारुड़ी कुँवर कन्हाई। एक बिटिनियाँ कारैँ खाई, ताकौँ स्याम तुरतहीँ ज्याई। बोलि लेहु अपने ढोटा कौँ, तुम कहि कै देउ नैँकु पठाई। कुँवरि राधिका प्रात खरिक गई, तहाँ कहूँ-धौँ कारैँ खाई। यह सुनि महरि मनहिँ मुसुक्यानी, अबहिँ रही मेरैँ गृह आई। सूर स्याम राधहिँ कछु कारन, जसुमति समुझि रही अरगाई ॥१३॥ अर्थ-हे महरि (यशोदा) कुँवर कृष्ण सांप के विष को मंत्र से उतारने वाले है। एक लड़की को सांप ने काट लिया, उसे कृष्ण ने तुरन्त जिला दिया। अपने पुत्र को बुला लो और तुम (स्वयं) कहकर उसे भेज दो। कुमारी राधा प्रातः पशुओं के चरने के स्थान पर गई थी वहाँ कही उसे काले सांप ने काट लिया। यह सुनकर महरि (यशोदा) ने मन ही मन मुस्करा कर सोचा, अभी तो हमारे ही घर थी। सूरदास कहते हैं कि यशोदा राधा की मूर्च्छा के मूल कारण को समझकर चुप हो गईं ॥१३॥ तब हरि कौँ टेरति नंदरानी। भली भई सुत भयौ गारुड़ी, आजु सुनी यह बानी। जननी-टेर सुनत हरि आए, कहा कहति री मैया ?। कीरति महरि बुलावन आई, जाहु न कुँवर कन्हैया। कहूँ राधिका कारैँ खाई, जाहु न आवौ झारि। जंत्र-मंत्र कछु जानत हौ तुम, सूर स्याम बनवारि ॥१४॥