भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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अर्थ—(राधा कहती है) ब्रज मे बसकर किसके बोल (व्यंग्य) सहूँ। कृष्ण तुम्हारे सिवाय मैं किसी और को नही जानती। संकोच के कारण तुमसे नही कहती हूँ। कुल की मर्यादा का निर्वाह कहाँ तक करूँगी, (उस स्थिति में) तुमको कैसे पाऊँगी। माता पिता सबको धिक्कार है। तुम से विमुख होकर जो जहाँ चाहे वहाँ बहे अर्थात् जो जैसा चाहे कहे। कोई कुछ भी करे, कुछ भी कहे, मैं हर्ष या विषाद कुछ नही मानती। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) कृष्ण तुम्हे बिना देखे, मैं शरीर, मन, जीव सब जला दूँगी ॥२२॥ ब्रजहिँ बसैँ आपुहिँ बिसरायौ । प्रकृति पुरुष एकहि करि जानहु, बातनि भेद करायौ । जल थल जहाँ रहौँ तुम बिनु नहिँ, वेद उपनिषद गायौ । द्वै-तन जीव-एक हम दोऊ, सुख-कारन उपजायौ । ब्रह्म-रूप द्वितिया नहिँ कोऊ, तब मन तिया जनायौ । सूर स्याम-मुख देखि अलप हँसि, आनंद-पुंज बढ़ायौ ॥२३॥ अर्थ - (कृष्ण कहते हैं) ब्रज में अपने (मूल रूप) को भुलाकर हम निवास करते हैं। प्रकृति और पुरुष को एक ही करके जानो, (दोनो मे) केवल कहने मे भेद किया गया है। जल, पृथ्वी कही भी, तुम्हारे बिना नही रहता हूँ, वेद तथा उपनिषद् (भी यही) कहते हैं। हम दोनो दो तन तथा एक जीव रूप मे सुख के लिए उत्पन्न हुए है। ब्रह्म का कोई दूसरा रूप नही है। इस प्रकार मन (की बात) प्रिया को (कृष्ण ने) जना दिया। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के मुख को देख कर राधा किंचित हँस दी और इस प्रकार उनका आनन्दोल्लास बढ़ गया ॥२३॥ तव नागरि मन हरष भई । नेह पुरातन जानि स्याम कौ, अति आनंद-भई । प्रकृति पुरुष, नारी मैं वै पति, काहैँ भूलि गई । को माता, को पिता, बंधु को, यह तो भेंट नई । जन्म-जन्म, जुग-जुग यह लीला, प्यारी जानि लई । सूरदास प्रभु की यह महिमा, यातैँ बिबस भई ॥२४॥ अर्थ—तब नागरि राधा का मन हर्षित हुआ। कृष्ण के पुरातन स्नेह को जानकर उन्हें अत्यधिक आनन्द हुआ। प्रकृति-पुरुष के रूप मे मैं नारी और वे पति हैं, (यह मैं) क्यों भूल गयी। कौन माता, कौन पिता, कौन भाई, यह तो नयी भेट (सम्बन्ध) है। जन्म-जन्म और युग-युग की इस लीला को प्यारी (राधा) ने जान लिया। सूरदास कहते हैं कि प्रभु की यह महिमा है जिससे (राधा) विवश हो गयी ॥२४॥ देह धरे कौ कारन सोई । लोक-लाज कुल-कानि तजियै, जातैँ भलौ कहै सब कोई ।