सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ सूरसागर सार सटीक मातु पिता के डर कौँ मानै, मानै सजन कुटुंब सब लोई । तात मातु मोहूँ कौँ भावत, तन धरि कै माया-बस होई । सुनि वृषभानु-सुता मेरी बानी, प्रीति पुरातन राखहु गोई । सूर स्याम नागरिहिँ सुनावत, मैं तुम एक नाहिं हैं दोई ॥२५॥ अर्थ—शरीर धारण करने का वही कारण है। लोक की लाज तथा कुल की मर्यादा न छोड़िये, जिससे सब लोग भला कहे। माता पिता के डर को माने तथा अपने सम्बन्धियो तथा कुटुम्बियो (के डर) को माने। पिता-माता मुझे (राधा को) भाते हैं। (क्योकि) शरीर धरकर (मै) माया बस हो गयी। (कृष्ण कहते हैं) हे वृषभानु की पुत्री मेरी बात सुनो, पुरानी प्रीति छिपाकर रखो। सूरदास कहते है कि नागरि राधा को (कृष्ण) सुनाते हैं कि हम तुम एक है, दो नही ॥२५॥ राधा-सखी संवाद घरहिं जाति मन हरष बढ़ायौ । दुख डारयौ, सुख अंग भार भरि, चली लूट सौ पायौ । भौँह सकोरति चलति मंद गति, नैंकु बदन मुसुकायौ । तहँ इक सखी मिली राधा कौँ, कहति भयौ मन भायौ । कुंज-सुवन हरि-संग विलस रस, मन कौ सुफल करायौ । सूर सुगन्ध चुरावनहारी, कैसैं दुरत दुरायौ ॥२६॥ अर्थ—घर जाते समय राधा का मन हर्षोल्लसित हो गया है। दुःख को छोड़ कर सुख के भार से अंगों को भरकर चली जैसे लूट का माल पा गयी हो। भौंह को सिकोड़ती, धीमी चाल से चलती हुई तनिक मुख पर मुसकान आ गयी। वहाँ एक सखी राधा को मिली और कहती है कि तुम्हारे मन को भाने वाला हुआ। कुंज के भवन मे कृष्ण के साथ विलसने का रस पाकर मन को सफल कर लिया। सूरदास कहते है कि (सखी कहती है) सुगंध को चुराने वाला छिपाने से कैसे छिप सकता है ॥२६॥ मोसीँ कहा दुरावति राधा । कहाँ मिली नंद-नंदन कौँ, जिनि पुरई मन की साधा । ब्याकुल भई फिरति हो अवहीँ, बाग-बिथा तनु बाधा । पुलकित रोम रोम गद गद, अब अंग अंग रूप अगाधा । नहिं पावत जो रस जोगी जन, जप तप करत समाधा । सुनहु सूर तिहिँ रस परिपूरन, दूरि कियौ तनु दाधा ॥२७॥ अर्थ—राधा मुझसे क्यो छिपाती हो। (तुम) कृष्ण को कहाँ मिली, जिन्होने मन की साध (इच्छा) पूरी कर दी। अभी व्याकुल होकर घूमती थी और शरीर काम की पीड़ा से दुखी था। (अब) रोम-रोम पुलकित तथा गद्गद है। अंग-अंग मे गहरा रूप निखर आया है। जो रस योगी जप, तप तथा समाधि करके भी नही पाते।