सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ सूरसागर सार सटीक राधा-कान्ह-कथा ब्रज-घर-घर, ऐसें जनि कहवैही। यह करनी उन नई चलाई, तुम जनि हमहिँ हँसैही। तुम ही बडे महर की बेटी, कुल जनि नाउँ धरैहौ। सूर स्याम राधा की महिमा, यहै जानि सरमैहौ ॥६७॥ अर्थ—तुम कुल वधू होकर निर्लज्ज मत होना। यह कार्य उन्ही (कृष्ण) के उपयुक्त है, (तुम) उनके साथ मत जाना। राधा और कृष्ण की कथा ब्रज के घर-घर मे इस प्रकार मत चलवाओ। उन्होने यह नयी करतूत चलायी है, तुम हमारी हँसी मत कराओ। तुम बड़े महर की बेटी हो, कुल का नाम मत घराओ। सूरदास कहते हैं कि (सखियाँ कहती हैं) कृष्ण और राधा (इन दोनो के नाम) की महिमा जानकर ही शर्म करो ॥६७॥ यह सुनि कै हँसि मौन रही री। ब्रज उपहास कान्ह-राधा की, यह महिमा जानी उनहीँ री। जैसी बुद्धि हृदय है इनकैँ, तैसीयै मुख बात कहीँ री। रवि की तेज उलूक न जानै, तरनि सदा पूरन नभहीँ री। विष को कीट विषहिँ रुचि मानै, कहा सुधा रसहीँ री। सूरदास तिल-तेल-सवादी, स्वाद कहा जानै घृतहीँ री ॥६८॥ अर्थ—यह सुनकर (राधा) हँसकर मौन रह गयी। ब्रज मे कृष्ण और राधा के उपहास की महिमा वे ही जानते हैं। उनकी जैसी बुद्धि है और जैसा हृदय है, वैसे ही मुख से बात कहते हैं। सूर्य के तेज को उल्लू नही जानता, लेकिन सूर्य (की किरणे) सदा आकाश मे व्याप्त हैं। विष के कीडो को विष ही रुचिकर होता है, अमृत के रस से उनका क्या प्रयोजन। सूरदास कहते हैं कि तिल के स्वादी घी के स्वाद को क्या जाने ॥६८॥ सहसा भेंट इततैं राधा जाति जमुन-तट, उततैं हरि आवत घर कौँ। कटि काछनी, वेष नटवर कौ, बीच मिली मुरलीधर कौँ। चितै रही मुख-इंदु मनोहर, वा छवि पर वारति तन कौँ। दूरिहु तैं देखत ही जाने, प्राननाथ सुंदर घन कौँ। रोम पुलक, गदगद बानी कहि, कहाँ जात चोरे मन कौँ। सूरदास-प्रभु चोरन सीखे, माखन तैं चित-वित्त-धन कौँ ॥६९॥ अर्थ—इधर से राधा यमुना के तट पर जाती है उधर से कृष्ण घर की तरफ आते हैं। कमर मे काछनी पहने हुए नटवर के वेष वाले मुरलीधर कृष्ण को वह बीच मे मिल गयी। वह चंद्रमा के समान मुख को देखकर उसकी मनोहर छवि पर शरीर को न्योछावर कर देती है। दूर से देखते ही (राधा) प्राणनाथ सुन्दर कृष्ण को जान गयी। पुलकित रोम से (राधा) गद्गद वाणी बोली कि (हे कृष्ण) मन को चुराकर कहाँ