सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १७३ जा रहे हो। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) माखन को चुराने से तुम चित्त रूपी धन-सम्पदा को चुराना सीख गये ॥६६॥ भुजा पकरि ठाढे हरि कीन्हे। बाँह मरोरि जाहुगे कैसेँ, मैं, तुम नीकैँ चीन्हे। माखन-चोरी करत रहे तुम, अब भए मन के चोर। सुनत रही मन चोरत हैं हरि, प्रगट लियौ मन मोर। ऐसे ढीठ भए तुम डोलत, निदरे ब्रज की नारि। सूर स्याम मोहूँ निदरौगे, देहुँ प्रेम की गारि ॥७०॥ अर्थ—भुजा पकड़कर (कृष्ण को राधा ने) खड़ा कर दिया। (और कहा) बाँह मरोड़ कर (तुम) कैसे जाओगे। मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। (पहले) तुम माखन की चोरी करते रहे, (अब) मन के चोर हो गये हो। (मैं) सुनती रही कि कृष्ण मन चुराते हैं, (आज) प्रकट हो तुमने मेरा मन चुरा लिया। तुम ऐसे धृष्ट हो कि ब्रज की स्त्रियो का निरादर करते डोलते हो। सूरदास कहते है (राधा कहती है) यदि हमारा निरादर करोगे तो मैं प्रेम की गाली दूँगी ॥७०॥ यह बल केतिक जादौ राइ। तुम जु तमकि कै मो अबला सौँ, चले बाहँ छुटक़ाइ। कहियत हो अति चतुर सकल अंग, आवत बहुत उपाइ। तो जानौँ जौ अब एकौ छन, सकौ हृदय तैँ जाइ। सूरदास स्वामी श्रीपति कौँ, भावत अंतर भाइ। सहि न सके रति-वचन, उलटि हँसि लीन्ही कंठ लगाइ ॥७१॥ अर्थ—हे यादवो के राजा यह कितना बल है जो तुम मुझ अबला (नारी) की बांह छुड़ाकरे चल पड़े। (तुम) कहते हो मैं समस्त अंगों से बहुत चतुर हूँ और (मुझे) बहुत से उपाय आते है। हम इसे तब जानेगी जब एक भी क्षण मे लिए मेरे हृदय से चले जाओ। सूरदास कहते है कि लक्ष्मीपति कृष्ण को अन्तर का भाव (बहुत) भाता है। वे रति के वचन को सह न सके और लौटकर उन्होने (कृष्ण ने) हंसकर (राधा को) गले से लगा लिया ॥७१॥ कुल की लाज अकाज कियौ। तुम बिनु स्याम सुहात नहीं कछु, कहा करों अति जरत हियौ। आपु गुप्त करि राखी मोकौँ, मैं आयसु सिर मानि लियौ। देह-गेह सुधि रहति बिसारे, तुम तैँ हितु नहिं और बियौ। अब मोकौँ चरननि तर राखौ, हँसि नंद-नंदन अंग छियौ। सूर स्याम श्रीमुख की बानी, तुम पैँ प्यारी बसत जियौ ॥७२॥ अर्थ—कुल की लाज ने कार्य में (काफी) विघ्न डाला। कृष्ण तुम्हारे बिना मुझे कुछ अच्छा नही लगता। क्या करूँ (मेरा) हृदय अत्यधिक जलता रहा है। आपने