भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

१७४ सूरसागर सार सटीक मुझे गुप्त करके रखा और मैंने आपकी आज्ञा मान ली। मैं शरीर तथा घर का ख्याल भुलाये रहती हूँ। तुमसे भिन्न (मेरा) और दूसरा कोई हितैषी नही है। अब मुझे चरणो के नीचे रखो। (इसके बाद) कृष्ण ने हँसकर (राधा के) अंग को छुआ। सूरदास कहते है कि कृष्ण ने सुन्दर मुख से कहा, प्यारी तुम्ही पर मेरे प्राण बसते हैं ॥७२॥ मातु-पिता अति त्रास दिखावति । भ्राता मोहिं मारन कौं घिरवै, देखैं मोहिं न भावति । जननी कहति बड़े की बेटी, तोकौं लाज न आवति । पिता कहैं कैसी कुल उपजी, मनहीं मन रिस पावति । भगिनी देख देति मोहिं गारी, काहैं कुलहिं लजावति । सूरदास-प्रभु सौं यह कहि-कहि, अपनी विपत्ति जनावति ॥७३॥ अर्थ--माता-पिता अत्यधिक भय दिखाते हैं। भाई मुझे मारने की धमकी देते हैं, यह देखकर मुझे (कुछ) भाता नही। माता कहती हैं बड़े की बेटी होकर तुम्हे लाज नही आती। पिता कहते हैं कि कैसी (लड़की) कुल में पैदा हो गयी। इससे मन-ही-मन क्रोध आता है। बहन देखकर मुझे गाली देती है कि क्यों कुल को लजावती हो। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से यह कह-कहकर (राधा) अपनी विपत्ति प्रकट करती है ॥७३॥ सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन । विमुख जननि की संगति कौं दुख, कब धौं करिहौ मोचन । भवन मोहिं भट्ठी सौं लागत, मरति सोचहीँ सोचन । ऐसी गति मेरी तुम आगेँ, करत कहा जिय दोचन । धिक वे मातु-पिता, धिक भ्राता, देत रहत मोहिं खोचन । सूर स्याम मन तुम्हहिँ लगान्यौ, हृदय-चून-रंग-रोचन ॥७४॥ अर्थ-कमल के दल के समान आँख वाले सुन्दर कृष्ण विमुख माताओ की संगति के दुःख से मुझे कब छुड़ाओगे । घर मुझे भट्ठा के समान लगता है, (मैं) सोच- सोचकर ही मरती हूँ। तुम्हारे आगे मेरा ऐसा हाल है, (तुम) जी मे दुविधा क्यो करते हो। उन माता-पिता को धिक्कार है तथा (उस) भाई को धिक्कार है जो (सदैव) हमे कोसते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) हे कृष्ण हमारा तुम्हीं से मन लग गया है, (हम तुम्हारे रंग मे) हल्दी और चूने के (रंग की तरह रंग गये है) मिल जाने से रोचना (लाल) के रंग में रंजित हो गये हैं ॥७४॥ कुल की कानि कहाँ लगि करिहौँ । तुम आगैँ मैं कहौँ जु साँची, अब काहू नहिँ डरिहौँ । लोग कुटुंब जग के जे कहियत, पेला सबहिँ निदरिहौँ । अब यह दुख सहि जात न मोपैँ, विमुख बचन सुनि मरिहौँ । आपु सुखी तौ सब नीके हैं, उनके सुख कह सरिहौँ । सूरदास प्रभु चतुरसिरोमनि, अबकें हौं कछु लरिहौँ ॥७५॥