सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १७५ अर्थ-कुल की मर्यादा (का ध्यान) कहां तक करूंगी। तुम्हारे आगे सच्ची वात कहती हूँ कि अब किसी को नही डरूँगी। घर, संसार के लोग जो (कुछ) कहते हैं उन्हे बलाव (हठपूर्वक) निरादर कर दूंगी। अब यह दुःख मुझसे नही सहा जाता । विमुख बचन सुन-सुनकर मर जाऊँगी। अगर आप सुखी है तो सब ठीक (ही) है। उनके सुख को पूरा कर डालूंगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि अबकी बार मैं (भी) कुछ लडूंगो ॥७५॥ प्राननाथ हो मेरी सुरति किन करौ । मैं जु दुख पावति हौं, दीनदयाल, कृपा करौ, मेरी कामदंद-दुख औ बिरह हरौ । तुम बहु रमनी रमन सो जानति हौं, याही के जु धौखैँ हौ मौसों काहैँ लरी । सूरदास-स्वामी तुम हौ अंतरजामी सुनो मनसा बाचा मैंँ ध्यान तुम्हरौई धरौ ॥७६॥ अर्थ-हे प्राणनाथ मेरी याद क्यो नही करते जो मैं दुःख पाती हूँ । दीनदयाल (मुझपर) कृपा करो, मेरी काम-पीडा दुःख तथा विरह को हरो । यह समझ कर कि मै जानती हूँ कि तुम अनेक रमणियो के साथ रमण करने 'वाले हो, मुझसे झगड़ा क्या करते हो। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कृष्ण तुम अन्तर्यामी हो। (ऐसा मैने) सुना है। (इसलिए) मन और वाणी से मै तुम्हारा ही ध्यान करती हूँ ॥७६॥ हौँ या माया ही लाँगी तुम कत तोरत । मेरी तौ जिय तिहारे चरननि ही मैं लाग्यौ, धीरज क्यों रहै रावरे मुख मोरत । कोऊ लै बनाइ बातैं, मिलवति तुम आगैं, सोई किन आइ मोसौँ अब है जोरत । सूरदास-पिय, मेरे तौ तुमहिँ हो जु जिय, तुम बिनु देखैँ मेरौ हिय ककोरत ॥७७॥ अर्थ-मैं तो आपकी इस माया (प्रेम) में ही लग गई (पग गई) हूँ, उसे आप क्यो तोडते है (नष्ट करते है) । मेरा तो हृदय तुम्हारे चरणो में ही लग गया है । तुम्हारे मुख मोड़ लेने पर मुझे धीरज किस प्रकार रहे। कोई वाते बनाकर तुम्हारे आगे (इधर-उधर) जोड़कर कहती है वही (लोग) आकर अब हमसे जोड़ती है। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि मेरे तो प्राण तुम ही हो तुम्हें बिना देखे मेरा हृदय कुरेदता है ॥७७॥ बिहँसि राधा कृष्न अंक लीन्ही । अधर सौं अधर जुरि, नैन सौं नैन मिलि, हृदय सौं हृदय लगि, हरष कीन्ही ।