सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १७७ जब देखौँगी वहै मोतिसरि, तबहीं तौ सचु पैहौँ। नातरु सूर जन्म भरि तेरो, नाउँ नहीं मुख लैहौँ ॥८०॥ अर्थ—सुनो राधा अब तुम पर विश्वास नही करूंगी। हार, चौकी, हमेल (कुछ भी) तेरे गले मे नही डालूंगी। तुमने लाख टका को हानि की है, वह जब तुमसे लूंगी (तभी और आभूषण पहनने को दूंगी)। हे अनाड़ी, हार बिना लाए (तुम्हे) घर में नही बैठने दूंगी। जब वही मोती का हार देखूंगी तभी सत्य मानूंगी। सूरदास कहते हैं कि (माता कहती है) नही तो जन्म भर तुमसे मुँह से नही बोलूंगी ॥८०॥ जैहै कहाँ मोतिसरि मोरी। अब सुधि भई लई वाही नैं, हँसति चली बृषभानु-किसोरी। अबहीं मैं लीन्हे आवति हौं, मेरैं सँग आवै जानि को री। देखौँ धौँ कहा करिहौँ वाकौ, बड़े लोग सीखत हैं चोरी। मौकौँ आजु अवेर लागि है, ढूढौँगी घर-घर ब्रज खोरी। सूर चली निधरक ह्वै सब सौं, चतुर राधिका बातनि भोरी ॥८१॥ अर्थ—मेरी मोती की माला कहाँ जायेगी। अब ख्याल हो गया, उसी ने ले लिया है। (यह कहकर) हंसती हुई राधा चली। अभी मैं लिये आती हूँ; मेरे साथ कोई मत आये। देखो (पकड़ने पर) उसका क्या करूँगी, बडे लोग (भी) चोरी सीखते हैं। आज मुझे देर लगेगी, (क्योकि) ब्रज की गलियो मे घर-घर (उसे) ढूंढूंगी। सूर- दास कहते हैं चतुर राधिका बातों से भुलाकर सबसे निधड़क होकर चली ॥८१॥ नंद-महर घर कें पिछवारैं राधा आइ बतानी। मनौ अंब-दल-मौर देखि कें, कुहुकी कोकिल बानी। झूठेहिं नाम लेति ललिता कौँ, काहैं जाहु परानी। वृन्दावन-मग जाति अकेली, सिर लै दही-मथानी। मैं बैठी परखति ह्वाँ रैहौँ, स्याम तबहिं तिहिं जानी। कोक-कला-गुन आगरि नागरि, सूर चतुरई ठानी ॥८२॥ अर्थ—नंद महर के घर के पीछे राधा ने आकर बाते की, मानो आम के कोमल पत्ते और बौर को देखकर कोयल कुहकी हो। झूठे ही ललिता का नाम लेती है कि क्यो भागी जा रही हो। वृन्दावन के मार्ग पर सिर पर दही और मथानी लिये अकेली चली जा रही है। मैं बैठकर यहां परखती रहूँगी। कृष्ण तभी उसे जान गये। सूरदास कहते हैं कि काम-कला के गुणों मे श्रेष्ठ राधा ने चतुराई ठानी ॥८२॥ सैन दै नागरी गई बन कौँ। तबहिं कर-कौर दियौ डारि, नहिं रहि सकै, ग्वाल जेँवत तजे, मोह्यौ उनकौँ। १२