भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

५७८ सूरसागर सार सटीक चले अकुलाइ बन धाइ, ब्याई गाइ देखिहौँ जाइ, मन हरष कीन्हौ। प्रिया निरखति पंथ, मिलैँ कब हरि कंत, गए इहिँ अंत, हँसि अंक लीन्हो। अतिहिँ सुख पाइ, अतुराइ मिले धाइ, दोउ मनी अति रंक, नव- निधहिँ पाई। सूर प्रभु की प्रिया, राधिका अति नवल, नवल नँदलाल के, मनहिँ भाई ॥८३॥ अर्थ—इशारा देकर नागरि राधा वन को गयी। तभी उसने (कृष्ण ने) हाथ का कौर रख दिया। अब उनके लिये रुकना सम्भव नही था। कृष्ण ने ग्वालों को भी मोह लिया और उन्हें भोजन करते छोड़ दिया। मन मे हर्ष करके, आकुल होकर वन को दौड़े कि ब्याई गाय देखूँगा। प्रिया रास्ता निहारती थी कि कंत कृष्ण (कब) मिलेंगे, इसी बीच वे पहुँचे और उन्होंने हँसकर उसे गोद मे ले लिया। अत्यधिक सुख पाकर दोनो आतुर होकर दौड़कर मिले जैसे दरिद्र को खजाना मिल गया हो। सूरदास कहते है कि कृष्ण की प्रिया राधा अत्यधिक सुन्दर है और सुन्दर कृष्ण के मन भा गयी है ॥८३॥ दीजै कान्ह काँधे कौ कंवर। नान्हीं नान्हीँ बूँदनि वरषन लाग्यौ, भीजत कुसुंभी अंबर। वार-वार अकुलाइ राधिका, देखि मेघ-आडंवर। हँसि हँसि रीझि बैठि रहे दोऊ, ओढ़ि सुभग पीतांबर। सिव सनकादिक नारद-सारद, अत न पावै तुंवर। सूर स्याम-गति लखि न परति कछु, खात ग्याल संग संवर ॥८४॥ अर्थ—हे कृष्ण कन्धे का कम्बल दीजिए। नन्ही-नन्ही बूंदे वरसने लगी, जिससे कुसुमी रंग का वस्त्र भीगता है। बादलों की उमड़-घुमड़ देखकर राधा बार-बार आकुल हो गयी। हँस-हँस कर तथा रीझकर दोनों (एक साथ) पीतांबर ओढ़कर बैठ गये। शिव, सनकादि, नारद, शारद, और तुंवर (कृष्ण का) अंत नही पाते। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण की गति कुछ भी दिखाई नही देती जो कि ग्वालो के साथ रास्ते का भोजन खा रहे हैं ॥८४॥ कान्ह कह्यौ वन रैनि न कीजै, सुनहु राधिका प्यारी। अति हित सौं उर लाइ कह्यौ, अब भवन अपनैं जा री। मातु-पिता जिय जानै न कोऊ, गुप्त-प्रीति रस भारी। कर तैं कौर डारि मैं आयौ, देखत दोउ महतारी। तुम जैसी मोहिं प्यारी लागति, चंद चकोर कहा री। सूरदास स्वामी इन बातनि, नागरि रिझई भारी ॥८५॥